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चमत्कारी संत बालुराम जी ’’बावजी’’

आम दिनों में रविवार को यहां जातरूओं की भीड़ रहती है। चमत्कारी बावजी के यहां आम लोगों से लेकर बड़े-बड़े राजनेता भी अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करवाने के लिए आते है। पूर्व मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाड़िया, पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष देवेन्द्र सिंह एवं पूर्व मंत्री रतनलाल तांबी सहित कई नेता बावजी के आते रहे है।

 

सत्यनारायण मेघवंशी –

भीलवाड़ा जिला मुख्यालय से पूर्व दिशा में 22 किलोमीटर दूर स्थित पिथास गांव में रहते है बालुराम जी मेघवंशी, इन्हें लोग ‘‘बावजी’’ कहते है। विभिन्न राज्यों से लोग बावजी के पास आते है। बावजी बताते है इन्होंने न कोई तप किया और ना ही किसी प्रकार की तंत्र साधना की। जन्म पिथास गांव में हुआ और वहीं बचपन गुजरा। बचपन से युवा होने तक घर, खेत व पिताजी के साथ बुनकरी का काम करते रहे। जब इनकी उम्र करीब 30 साल की थी तब एक दिन खेत पर काम करके आराम करने के लिए खेत की मेड़ पर लगे बोरड़ी (बैर) के पेड़ के नीचे बैठे थे, पास ही में बोरड़िया महादेव का स्थान था, वहां बैठे-बैठे उन्हें बोरड़िया महादेव से साक्षात्कार हुआ। उस दिन से वे बोरड़िया महादेव की नियमित पूजा करने लगे। धीरे-धीरे लोग वहां आने लगे, वे बारिश के बारे में, फसलों व उपज के बारे में बालुराम जी से पूछते थे। बालुराम जी भविष्यवाणी करते और उनकी भविष्यवाणी चरितार्थ होती गई और लोग इन्हें बावजी कहने लग गए।

बालुराम जी बताते है कि मुझे किसी प्रकार का ज्योतिष ज्ञान नहीं है और ना ही मैं कोई गणितज्ञ हूं, बोरड़िया महादेव का ही आर्शीवाद है कि मेरी वाणी सत्य हो जाती है। लोग यहां संतान प्राप्ति के लिए, लाइलाज बिमारियों को ठीक करवाने, मुहुर्त करवाने आदि के लिए आते है।

भीलवाड़ा के श्याम लाल डाड की पत्नि रामकन्या देवी के पैर में नासूर हो गया था, डॉक्टरों ने पैर काटने की बात कह दी। वे पैर नहीं कटवाना चाहते थे, कहीं से उन्हें बावजी के बारे में ज्ञात हुआ तो वे पिथास गए और बावजी को बताया। बावजी ने पैर पर ना कोई दवा लगाई, ना ही किसी प्रकार की भभूत अथवा पानी लगाया। बस काफी देर तक पैर को देखते रहे। उसके बाद 8 दिन में पैर ठीक हो गया।

बावजी आज भी बोरड़िया महादेव की नियमित पूजा करते है। नवरात्रि में नवमी व दशमी के दिन वहां भारी भीड़ रहती है। कहते है एक बार दशमी के दिन बड़ी संख्या में जातरू आए हुए थे, जातरूओं के लिए प्रसादी बनाई जा रही थी, अचानक हल्की-हल्की बारिश आने लगी, जातरू दौड़कर बावजी के पास गए और कहा कि बारिस आ गई है अब प्रसादी कैसे बनाएं। बावजी ने आकाश की ओर देखा और हाथ से इशारा किया, जैसे किसी को चले जाने के लिए कह रहे हो। बारिश बंद हो गई और उस दिन केवल पिथास के दो किलोमीटर के दायरे में बारिश नहीं हुई।

यहां एक ओर भी चमत्कार है। कहते है नवरात्रा के दौरान नवमी व दशमी के दिन परिसर में चींटियों का प्रवेश बंद रहता है। सुनने में अजीब लगता है लेकिन यह सच है। इस दो दिनों में वहां एक भी चींटी दिखाई नहीं देती है।

यहां नवरात्रा की पंचमी पर करीब 3000 श्रृद्धालुओं के लिए भोजन बनवाया जाता है वो भी केवल 30 किलो शक्कर में। आश्चर्य वाली बात है कि उस 30 किलोग्राम शक्कर में इतने लोगों के लिए दो तरह की मिठाईयां बनाई जाती है। कहते है उस मिठाई में से भी बहुत बच जाती है जो गांव के बच्चों को वितरित की जाती है।

इस स्थान की सबसे अच्छी बात यह है कि यहां किसी प्रकार का छुआछुत नहीं है। सभी जातरू एक ही परिण्डे़ (वह स्थान जहां पानी की मटकियां रखी जाती है) का पानी पीते है।
मुम्बई, बैंगलौर, अहमदाबाद, हरिद्वार, दिल्ली, मेरठ, मुज्जफरनगर, जयपुर सहित देश के कई राज्यों से लोग यहां आते है, जिनमें डॉक्टर, इंजिनियर व बड़े उद्यमी भी होते है। अकेले मुम्बई में 20 स्थानों पर बावजी की चरण पादुकाओं की पूजा की जाती है। बड़े-बड़े उद्यमी व डॉक्टर नई कम्पनी, फैक्ट्री व अस्पताल का मुर्हुत बावजी के हाथों करवाते है।

उदयपुर में एक परिवार के लोगों से बातचीत करते बावजी

नवरात्रा के दौरान लोग अपनी नई कारों, मोटर साइकिलों, बसों, ट्रेक्टरों इत्यादि संसाधनों के मुर्हुत बावजी के हाथों से करवाते है। नवमी व दशमी के दिन तो वाहनों की लम्बी कतारें लग जाती है। मान्यता है कि बावजी जिस वाहन का मुर्हुत करते है या हाथ लगा देते है उसका कभी एक्सीडेंट नहीं होता है।

एक अद्भूत चमत्कार यहां नवरात्रा में दिखाई पड़ता है। नवरात्रा में ज्चारें (गेहूं का पौधा) उगाए जाते है, आमतौर पर मिट्टी के मटके या जमीन में ज्वारें उगाए जाते है लेकिन बावजी के यहां पक्की फर्श पर ऐसे ही गेहूं डाल दिए जाते है और उन पर पानी डाल दिया जाता है, उन्हें रोजाना सींचा जाता है और नवमी, दशमी तक तो ज्चारें उतने ही बड़े हो जाते है जितने की मिट्टी में बोए हुए होते है।

दूर-दूर से आने वाले भक्त लोग केसरयुक्त दूध से बावजी के चरण धोते है और चरणामृत लेते है। वहीं उनके अभिवादन में गुलाबफूल चढ़ाए जाते है। भक्त चढ़ावा भी चढ़ाते है, बावजी चढ़ावे की राशि को भी जनहित में खर्च कर देते है। उन्होंने सोलंकियों का खेड़ा के बसस्टेण्ड पर सराय व प्याऊ का निर्माण करवाया, श्मसान घाट में अपनी माता की याद में कुंआ खुदवाया, वहां हेण्डपम्प लगवाया, पिथास में माताजी के मंदिर पर भी हेण्डपम्प लगवाया। 10 वर्ष पूर्व रामदेवरा जाने वाले यात्रियों के लिए बनका खेड़ा में राम रसोड़ा चलवाया।

बावजी जी अपने भक्तों को स्वाभिमान से जीने का उपदेश देते है। वे खुद भी स्वाभिमान के साथ जीते है। कुछ सालों पूर्व तक पिथास गांव में दलितों को घोड़ी पर बैठकर बिन्दौली निकालने की मनाही थी। बिन्दौली निकालने पर गांव वालों द्वारा भारी विरोध होता था। बावजी ने सन् 1999 में अपने पुत्र का विवाह करवाया और पुलिस जाप्ते में पिथास गांव में अपने पुत्र की घोड़े पर बिन्दौली निकलवाई।

आम दिनों में रविवार को यहां जातरूओं की भीड़ रहती है। चमत्कारी बावजी के यहां आम लोगों से लेकर बड़े-बड़े राजनेता भी अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करवाने के लिए आते है। पूर्व मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाड़िया, पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष देवेन्द्र सिंह एवं पूर्व मंत्री रतनलाल तांबी सहित कई नेता बावजी के आते रहे है।

* साभार – रिखिया प्रकाशन

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