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कौन है राज तिलक स्थली की दुर्दशा के जिम्मेदार ?

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राज तिलक झीर्णशीर्ण हो चुका है। उसे बने हुए अभी एक दशक भी पूरा नहीं हुआ है। उसकी वर्तमान हालत पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत है लेकिन सवाल यह है कि इस दुर्दशा के जिम्मेदार कौन है ? राजनेता ? प्रशासन ? आखिर राज तिलक स्थल को बर्बाद किन लोगों ने किया, टॉयलेट किसने तोड़े, किसने लाइटों को फोड़ा ? क्या आमजन की भी कोई जिम्मेदारी है या . . . या जनता की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ जिन्दाबाद या मुर्दाबाद करने तक की ही है ?

लखन सालवी (गोगुन्दा/उदयपुर) –

आज महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि है। मेवाड़ में ही नहीं बल्कि पूरे देश में जगह-जगह विभिन्न आयोजन हो रहे है। हल्दीघाटी में प्रताप के स्वाभिमानी घोड़े चेतक की याद में अश्व मेले का आयोजन किया रहा है। प्रताप गौरव केंद्रों पर समारोह आयोजित किए जा रहे है, वहीं गोगुन्दा स्थित महाराणा प्रताप राजतिलक स्थली पर लगी महाराणा प्रताप और भीलू राणा पूंजा की प्रतिमाएं आंसू बहा रही है।  आइए देखते है राज तिलक स्थली की दशा –

मेवाड़ की धरती को महाराणा प्रताप की शोर्य गाथाओं, उनकी स्वाभिमानी और वीरता ने पूरे विश्व में विख्यात किया। महाराणा प्रताप ने अपने संघर्षपूर्ण जीवन का अधिकतर समय मेवाड़ के गोगुन्दा क्षेत्र में बिताया। इस क्षेत्र में रहकर उन्होंने अपनी सेना बनाई, शस्त्रागार बनाए और युद्ध किए। महाराणा उदय सिंह की मृत्यु के बाद जगमाल को महाराणा घोषित करने से खफा मेवाड़ और वागड़ के सरदारों ने प्रताप को महाराणा घोषित किया और गोगुन्दा में उनका राजतिलक किया। महाराणा प्रताप के जीवन से जुड़े ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण करने व इन स्थलों को पर्यटन की दृष्टि से बढ़ावा देने के के लिए राज्य सरकार ने मेवाड़ कॉम्लेक्स योजना के तहत करोड़ों रूपए खर्च कर विकास कार्य करवाएं। गोगुन्दा में भी राज तिलक स्थली पर विकास करने के लिए वर्ष 2006 में 6 करोड़ 76 लाख रूपए स्वीकृत किए गए। यहां पाथवे, म्यूजियम, एम्पीथियेटर, रेस्टोरेन्ट व बावड़ी व अन्य स्ट्रेक्चर के लिए रेस्टोरेशन का कार्य करवाया गया। देखरेख के अभाव में यह स्थल महज 10 सालों में झीर्णशीर्ण हो गया है। गुणवत्तापूर्ण निर्माण न होने और देखरेख के अभाव में बदमाशों ने तोड़फोड़ कर क्षतिग्रस्त कर दिया है।

1. हॉल के अंदर टूटा पड़ा बिजली एक्सटेंशन          2. क्षतिग्रस्त टॉयलेट        3. उखड़ी हुई फर्शी

उल्लेखनीय है कि सन् 1572 में होली के दिन गोगुन्दा में महादेव मंदिर के पास महाराणा प्रताप का राज तिलक हुआ था। जहां एक छतरी के नीचे महाराणा प्रताप की प्रतिमा स्थापित है। इसके पास 15-20 बीघा भूमि में पर्यटन विभाग ने इस स्थल पर 2006-07 में विकास कार्य करवाए। मेवाड़ कॉम्पलेक्स योजना के तहत स्थल का विकास एवं कर्न्वसेसन कार्य किए गए।

घटिया निर्माण व देखरेख के अभाव में यह स्थल उजाड़ हो चुका है। मुख्य प्रवेश द्वार को देखकर इसकी दुर्दशा का अंदेशा हो जाता हैं। स्थल पर जाने वाली मुख्य सड़क टूट चुकी हैं, सीमेन्ट की सड़क से गिट्टी अलग होती जा रही हैं। पर्यटकों व ग्रामीणों सहित पशु भी आराम से यहां आ-जा सकते हैं। कोई रोकने टोकने वाला नहीं हैं। द्वार पर प्रहरी कक्ष बने हुए है, जो जीर्णशीर्ण हो गए हैं। इनकी खिड़कियों के शीशे फोड़ दिए गए हैं, इनमें कचरा भरा हुआ हैं। अन्दर जाने पर पहली नजर टूटे पाइपों पर पड़ती हैं, इस स्थल पर हुए निर्माण कार्य के बाद टूटे हुए पाइप को प्रांगण में डाल दिया गया, जिन्हें आज तक नहीं उठाया गया हैं। दिवारों पर लगाई गई एक भी लाइट सुरक्षित नहीं बची हैं। असामाजिक तत्वों ने पत्थरां से उन पर जमकर निशाने आजमाए हैं।

1. फव्वारा कुण्ड़                              2. फव्वारा नाली              3. प्रतिमा के नीचे वाले कुण्ड की दशा

स्थल पर थियेटर के बाहर बनाए गए कॉरिडोर की दिवारें पोली हो गई हैं। पत्थरों के बीच से सीमेन्ट बाहर आती जा रही हैं। कॉरिडोर की सीढ़ियों को देखकर लगता हैं जैसे बरसों से सफाई नहीं हुई। यह घटिया निमार्ण की ही बानगी हैं कि दिवारों में घास उग आई हैं। दिवारों में चिने गए पत्थरों के बीच से सीमेन्ट निकल गई हैं।

पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए लाखों की लागत से बने इस कॉरिडोर को देखने के लिए पर्यटन विभाग आखिर किसे आमंत्रित कर रहा हैं ? यह समझ से परे है। थियेटर के प्रवेश द्वार पर लगे तालों पर जंग लग चुका हैं। अब इन्हें चाबियों से खोलना भी नामुमकिन हैं। थियेटर का कॉरिडोर असामाजिक तत्वों के लिए शरण स्थल हैं। वे यहां बैठकर धूम्रपान, मदपान करते देखे जाते हैं और अपनी गतिविधियों की निशानी भी छोड़ जाते हैं।

पर्यटकों व आगन्तुकों के लिए पेयजल की व्यवस्था के लिए पानी की टंकी बनाई गई और कॉरिडोर के पास टोंटिया लगाई गई, जो अब विक्षिप्त कर दी गई हैं। पर्याप्त रोशनी रहे, इस हेतु लगाई लगी ट्यूबलाइटों को फोड़ दिया गया हैं। सुन्दर दिखाने के लिए लगाई गई सिलिंग लाइटें भी अब नहीं रही। रात के समय अंधेरा व्याप्त रहता हैं।

1. क्षतिग्रस्त एम्पीथियेटर                 2. एम्पीथियेटर के बाहर               3. एम्पीथियेटर के बाहर लॉबी

गार्डन के पास लगी महाराणा प्रताप व भीलू राणा पूंजा की भव्य एवं विशाल प्रतिमाएं गौरव स्थल की दुर्दशा पर आंसू बहा रही हैं। मानो कह रही हो, स्वाभिमानी क्षेत्र की जनता से इतनी बेरूखी की उम्मीद तो न थी। यह मूर्तियां वर्ष 2009 में लगाई गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इन मूर्तियों का अनावरण किया था। उस समय इस स्थल का विकास चरम पर था। प्रताप की मूर्ति के नीचे बनाया गया कुण्ड़ सूखा पड़ा हैं, जिसमें गुटखों व पेय पदार्थों के पाउच व अपशिष्ट पड़े दिखते है।

गार्डन में लगा पौधा

इस स्थल के बीच में गार्डन भी बनाया गया। म्यूजियम के पास फव्वारा संयत्र लगाया गया। इस कुण्ड से लगातार पानी बहता रहता था, जो एक सुन्दर नाली से होता हुआ प्रताप की मूर्ति के नीचे बनाए गए कुण्ड़ में जाकर एकत्र होता था। नाली में लगाए गए फव्वारों पर मिट्टी जमने से उन पर जंग लग चुका है। नाली में भारी मात्रा में कचरा जमा हैं, जिसे हटाने वाला कोई नहीं हैं। नाली के दोनों ओर लगी टाइल्स फोड़ दी गई हैं।

ग्रामीण बताते है कि पिछले 3 सालों में यह स्थल उजाड़ हुआ हैं। यहां रेस्टोरेन्ट भी बनाया गया जो आरम्भ होने से पहले ही उजड़ गया। समाज कंटकों ने खिड़कियों, दरवाजों व छत पर लगे केवलू तोड़ फोड़ दिए।

पर्यटक स्थल का विकास करने के साथ ही सोचा गया कि यहां सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन होते रहेंगे। इस हेतु गार्डन के पास सुन्दर रंगमंच बनाया गया। दर्शकों के बैठने के लिए सीढ़ीनुमा दर्शकदिर्घा बनाई गई जो टूट चुकी है। दर्शकदिर्घा में कई तरह की झाड़ियां व घास उग आई हैं। सीढ़ियों की दिवारों में लगी लाइटें फोड़ दी गई हैं। दिवारों में बड़ी बड़ी दरारें पड़ गई हैं। सीढ़ियों पर लगी फर्शी स्वतः ही उखड़ रही हैं। दिवारों में बड़े बड़े गड्ढ़े हो गए हैं। हालात ऐसे हैं कि इन सीढ़ियों पर चढ़ने से भी डर लगता हैं।

रंगमंच की दशा

यह पूरा स्थल महज एक चौकीदार के भरोसे हैं। जिसे पिछले 3 साल से वेतन नहीं दिया गया हैं। चौकीदार रतन लाल चौधरी इस स्थल के बारे में बताते-बताते रो पड़े। उन्होंने बताया कि यह स्थल तीन साल पहले बहुत सुन्दर था। शाम होते ही कस्बे के बच्चे, महिलाएं, युवक-युवतियां यहां घूमने आते थे लेकिन उसके बाद न पेड़ पौधों के लिए पानी की व्यवस्था की, न आमजन के लिए पीने के पानी व्यवस्था है, न बिजली की व्यवस्था है।

इस गौरव स्थल की बर्बादी में जितना जिम्मेदार पर्यटन विभाग तो हैं ही, उससे भी अधिक यहां की जनता जिम्मेदार हैं। यहां प्रताप फोर्स, राणा पूंजा विकास समिति जैसे संगठन है, इन संगठनों ने भी इसकी सुध नहीं ली।

‘‘राज तिलक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थल है। इस स्थल की स्थिति जैसी होनी चाहिए वैसी नहीं है। यह बहुत दुखदायी बात है।’’ – कपिलदेव पालीवाल, सेमटाल

‘‘राज तिलक स्थली के डवलपमेंट के बाद, इसकी देखरेख का जिम्मा 2 साल के लिए पर्यटन विभाग ने स्व. नरेन्द्र सेवा संस्था को दिया। इस संस्था ने प्रयास कर दिवारें बनवाई, पाइप लाइन डलवाई, गार्डन में पेड़-पौधे लगवाए और देखरेख की। 2 साल बाद भाजपा सरकार बन गई और स्थानीय नेताओं ने राजनीति करके पर्यटन विभाग से संस्था को काम नहीं देने दिया और इन लोगों ने देखरेख की नई व्यवस्था भी नहीं की, नतीजा आपके सामने है।’’ – अभिमन्यू सिंह झाला, पूर्व उपप्रधान – गोगुन्दा

मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, केंद्रीय  गृहमंत्री राजनाथ सिंह, गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया सहित कई भाजपा के नेता प्रताप गौरव स्थल पर आए। स्थल के विकास के लिए कोई प्रयास नहीं किए, यहां तक कि देखरेख की व्यवस्था भी नहीं करवा पाएं। – ग्रामीण

‘‘महाराणा प्रताप की राजतिलक स्थली को विकसित बनाने के लिए मैंनें पैरवी की, विधानसभा में सवाल भी पूछे, हाल ही में इस स्थल पर आर्ट गैलेरी व ऑडिटोरियम के लिए 01 करोड़ 58 लाख रूपए स्वीकृत हुए है। शीघ्र ही कार्य आरम्भ करवा दिए जाएंगे और देखरेख के स्थायी प्रबंध किए जाएंगे।’’ – प्रताप लाल भील, विधायक – गोगुन्दा

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