आमजन के लिए आमजन द्वारा

कड़ी से कड़ी जुड़ी तो है, फिर क्यों विकास नहीं हो रहा है ?

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कलयुगी संजय की कलम से (धृतराष्ट्र के बिना) –

जब -जब जनता की नहीं सुनी जाएगी. . . जब -जब व्यवस्था चरमरा जाएगी. . ., जब सुनने वाले कान बंद कर लेंगे. . ., जब नेता बेलगाम हो जाएगा और इन सब के बावजूद जब विपक्ष भी चुप्पी साध लेगा तब. . . तब कलयुगी संजय हाजिर हो जाएगा. .

मुझे वो दृश्य दिखाई पड़ रहे है जब नेता वोट मांगने निकले थे . . .

‘‘कड़ी से कड़ी जोड़ेंगे तो विकास की बयार बहा देंगे।’’ यह कोई नई बात नहीं है। आपने और मैंनें कई बार चुनावों के दौरान इस लाइन को सैकड़ों बार, सैकड़ों बड़े और छोटे नेताओं के मुंह से सुनी है। कड़ी इस प्रकार बनती है – वार्ड पंच-सरपंच, पंचायत समिति सदस्य-प्रधान, जिला परिषद सदस्य-जिला प्रमुख, विधायक-मुख्यमंत्री, सांसद-प्रधानमंत्री। यह कड़ी है जिसे जोड़ने की बात बार-बार हर चुनाव में कही जाती है। गत लोकसभा चुनाव, विधानसभा चुनाव और पंचायतीराज चुनाव में आदिवासी क्षेत्र के लोगों ने इस कड़ी को जोड़कर चैन की सांस ली। सोचा कि चलो इस बार कड़ी से कड़ी को जोड़ देते है, अब तो विकास होगा। मगर यह क्या, हालत तो वो की वो है।

जनता के लिए विकास के मायने यह है कि गांवों में मूलभूत सुविधाएं हो यथा बिजली, पानी, आवास, भोजन, सड़क, परिवहन, शिक्षा व स्वास्थ्य की व्यवस्थाएं हो। जनता की समस्याओं की सुनवाई हो और भ्रष्टाचार से मुक्त व्यवस्था हो। विधानसभा चुनाव को ढ़ाई वर्ष से अधिक समय हो चुका है। अभी तक जनता को विकास नजर नहीं आया है। लोगों का कहना है कि कुछ भौतिक कार्य हुए है लेकिन केवल उनसे विकास की बात पर मुहर नहीं लग सकती।

अब मुझे आज की स्थिति दिखाई दे रही है, गांवों के दृश्य दिख रहे है –

बिजली की हालत वैसी की वैसी है, पानी के लिए महिलाओं को अभी भी कुंओं पर जाना पड़ रहा है और जान जोखिम में डालकर कुंओं में उतर कर पानी लाना पड़ रहा है, सैकड़ों हेण्डपम्प खराब पड़े है, कई हेण्डपम्प हवा फैंक रहे है। तो कुल मिलाकर पेयजल जो कि जीने के लिए मूलभूत आवश्यकता है, वो भी पूरी नहीं हो पाई है।

आवास योजनाओं का लाभ सबसे जरूरतमंद को नहीं मिलकर ‘‘मिलने’’ वालों को ही मिला है। एक ग्राम पंचायत क्षेत्र के सैकड़ों गरीब लोगों के स्वीकृत हुए आवासों के रूपए पूर्व सरपंच व मिनी बैंक वाले चटकार गए। पर गरीबों की शिकायत पर कार्यवाही अभी तक नहीं हो पाई।

सड़कें खूब स्वीकृत हुई लेकिन जहां सर्वाधिक जरूरत है, वहां अभी तक ठीक ठाक कच्चे रास्ते भी नहीं है। जो सड़कें नई बनी है, वो एक चौमासे को झलने के लायक भी प्रतीत नहीं हो रही है।

परिवहन की दशा वो ही है जो बरसों पहले से चली आ रही है। आदिवासी क्षेत्र में जीपें जिन्दाबाद है और जिन्दाबाद रहेगी, ऐसा लगता है। शायद यहां के नेता 7 सीटर जीप में 30-35 सवारियों को लाने व लेजाने की विलक्षण कला को विलुप्त नहीं होने देना चाहते है।

शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर लिखने की जरूरत नहीं है क्योंकि आप सब जानते है।

जब डॉक्टर आराम फरमाते हो और फला आश्रम के छोरे गर्भवती महिला की डिलवरी करवाकर चार आना चांदी कूट लेते है तो कूट लेते है, ये तो उनकी मेहनत का प्रतिफल। जनाब डॉक्टर साहब… इस फला आश्रम के नौसिखिए के कारण किसी गर्भवती की जान चली गई तो . . .। उस दिन सारा आराम हराम हो जाएगा।

जनसुनवाई – इसके हाल बुरे है। राजस्थान जनसुनवाई का अधिकार अधिनियम के तहत हर माह के दूसरे शुक्रवार को उपखण्ड स्तर पर जनसुनवाई का आयोजन किया जाना चाहिए। मैंनें तो नहीं देखी जनसुनवाई . . .। जनता ने शिकायतें करना बंद कर दिया है, क्योंकि सुनवाई ही नहीं होती। हेण्डपम्प ठीक करवाने की मांग अगर विकास अधिकारी से लेकर उपखण्ड अधिकारी तक कर दी जाए और हेण्डपम्प ठीक नहीं हो तो इससे जनता की सुनवाई का अंदाजा लगाया जा सकता है। सुनने में आया है कि यहां ठेकेदारों की सुनवाई, भू माफियाओं की सुनवाई और प्रोपर्टी व्यवसायियों की सुनवाई तुरन्त हो रही है ले दे के।

भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था – इस व्यवस्था की सब को चाहत है। क्षेत्रवासी भी चाहते है लेकिन हो क्या रहा है। पुलिस थाने में जाने वाले पीड़ित व्यक्ति को न्याय के लिए अघोषित फीस चुकानी पड़ती है। भ्रष्टाचार युक्त व्यवस्था के कारण शराब रात भर बिकती है, किराणें की दूकान वाला बैखौफ गांजें की बिक्री करता है, हफ्ते की सेटिंग के चलते ही तो बदनाम होटलों के सुनसान कमरों और हाइवे की चौड़ी सड़क पर काली मारूति कार में वैश्यावृति होती है।

नए थानेदार जी जब से आए है, रात-दिन डोडा पोस्त और अफीम तस्करों के पीछे लगे हुए है। ऐसे पीछे पड़े हुए है कि उनकी आंखें भी लाल रहने लगी है, चेहरा सूजा-सूजा सा रहता है। वे अपना ज्यादा समय एनडीपीएस की कार्यवाही को दे रहे है। हालांकि इस कार्यवाही में उन्होंने सफलता अर्जित की है, गोगुन्दा में नियुक्ति के बाद उन्होंने 4 मामले पकड़ें है। आजकल पुलिस थाना एंटी ड्रग्स स्क्वायर्ड के मुख्यालय जैसा लगने लगा है। 10-15 योद्धा ऐसे घूमते हुए दिखाई देते है कि थाने में जाने से भी डर लगता है। हालांकि वे एंटी ड्रग्स स्क्वायर्ड टीम के सदस्य है और वो वाला ही काम करते है। मालखाने में डोडा पोस्त के कट्टे जमा होते जा रहे है, शायद अलगे महिने एक कमरा किराए पर ना लेना पड़ जाए। वहीं हाल ही में घटामाता मंदिर परिसर में हुए ब्लाइंड मर्डर केस का खुलासा कर आरोपियों को गिरफ्तार किया है।

विधायक महोदय राज्य सरकार से विकास के लिए इतनी राशि ला चुके है कि न तो उसकी गिनती हो पा रही है और ना ही विकास कार्यों की निगरानी हो पा रही है। उनको विकास कार्य करवाने की इतनी जल्दी पड़ी हुई है कि अपने चेहतों को बोल के फटाफट शिलालेख छपवा रहे है और 5-7 की मण्डली में मौके पर पहुंच कर शिलान्यास करवा रहे है। वो भी सोच रहे है कि ‘‘मोदी जी की वजे सूं नीट मौको मिल्यों है, तमाम काला भाटा पे नाम लिखाय दूं।’’ इस महीने में उन्होंने कई शिलान्यास किए। कहीं सरपंच का नाम शिलान्यास पट्टिका में नहीं लिखवाया, कहीं सरपंच का नाम तो लिखा पर उसे बुलवाना भूल गए। एक महिला प्रधान को तो जानबूझ कर नहीं बुलाया गया।

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मैं पहले ही बता चूका हूं कि ‘‘वार्डपंच-सरपंच, पंचायत समिति सदस्य-प्रधान, जिला परिषद सदस्य-जिला प्रमुख, विधायक-मुख्यमंत्री, सांसद-प्रधानमंत्री’’ ये वे कड़ियां है जो जुड़ती है तो आमजन को विकास देखने को मिल सकता है। अगर इनमें से एक भी कड़ी टूटती है तो विकास में व्यवधान पड़ने की पूर्ण संभावना रहती है।

अपने विधायक महोदय शायद भूल गए है कि वार्डपंच-सरपंच, पंचायत समिति सदस्य-प्रधान, जिला परिषद सदस्य-जिला प्रमुख एक विधायक और जनता के बीच की कड़ियां है। और इनमें से एक भी कड़ी डिस्टर्ब होती है तो प्रधानमंत्री का सपना सही मायने में साकार नहीं हो पाएगा।

बहरहाल आमजन और प्रधानमंत्री के बीच की सभी कड़ियां सही सलामत है, केवल विधायक महोदय वाली कड़ी कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। वो अपने साथ वाली दूसरी कड़ियों को भूलते जा रहे है, विधायक जी अगर इन कड़ियों को भूल जायेंगे तो अगले चुनाव में कड़ी से कड़ी को कैसे जोड़ पायेंगे ?

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