आमजन के लिए आमजन द्वारा

बे-आबरू करती जिंदगी

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बे-गरूर मिली जिंदगी,
बे-अदब कर रही जिंदगी,
अदब से जीने की कशिश में,
बे-आबरू करती जिंदगी।

कांटो में गुजरती गुलाब की जिदंगी,
किचड़ में आशिया बनाती कमल की जिदंगी,
कचरा इकट्ठा करती गरीब की जिदंगी,
गृह-क्लेश मे खत्म होती बुजूर्ग की जिदंगी।

बचपन में मिट्टी में खेलती जिंदगी,
जवानी में मिट्टी से दूर होती जिंदगी,
वक्त है अभी भी अपनेपन से जीना जिंदगी,
वर्ना अपनों में बेगानी होती है जिंदगी।

अदब से जीने की कशिश में,
बे-आबरू करती जिंदगी।

कमल चोटिया, लक्ष्मणगढ़

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