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हाल ही में आमेट में वीर पत्ता सर्किल बनाया गया . . . कौन थे वीर पत्ता ?

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मुबारिक अजनबी/आमेट/राजसमंद – आमेट उपखण्ड मुख्यालय को वीर पत्ता की पावन भूमि कहा जाता हैं। पांच शताब्दी पूर्व वीर पत्ता की वीरता का परचम यहां से फैला।

हाल ही में आमेट में वीरपत्ता सर्किल का निर्माण करवाया गया। नगर पालिका अध्यक्ष नर्बदा देवी बागवान के प्रस्ताव पर यह संभव हुआ। युवा मार्बल उद्यमी समाज सेवी भरत कुमार बागवान के मार्गदर्शन में यह कार्य सम्पन्न हुआ। निर्माण के लिए वीर पत्ता के वशंज आमेट के ठिकानेदार रावत प्रभु प्रकाश सिंह ने भी आर्थिक सहयोग दिया। महाराणा महेन्द्र सिंह मेवाड, विधायक सुरेन्द्र सिंह राठौड़, आमेट ठिकाने के रावत प्रभू प्रकाश सिंह, नगर पालिका चैयरमेन नर्बदा देवी बागवान, समाजसेवी भरत बागवान आदि द्वारा बड़ी संख्या में राव उमराव की मौजूदगी में वीरपत्ता सर्कल का लोकार्पण 13 जुलाई 2016 को किया गया।

वीर पत्ता अपने समय के मेवाड़ के बहुत प्रसिद्ध इतिहास पुरूष रहे। वे वीर योद्धा, कुशल राजनीतिज्ञ और मेवाड़ की स्वतंत्रता की रक्षा में वीर गति पाने वाले देशभक्त थे। वीरपत्ता का बलिदान मेवाड़ के लिए महत्वपूर्ण है। वीर पत्ता ने जयमल राठौड़ के साथ अकबर के विरूद्ध चित्तौड़ के युद्ध में सेना का नेतृत्व संभाला। मेवाड़ के महाराणा राजवंश और चित्तौड़ की गौरवगाथा में वीर पत्ता का नाम सुनहरे अक्षरों में उकरा हुआ है।

मंडोर परिवार की राजकुमारी हंसा की सगाई का नारियल मेवाड़ के युवराज चूड़ा को देने वहां के राजपुरोहित चित्तौड़ के राजमहल में आए थे। तब महाराणा ने हंसते हुए कहा कि अब हम बूढ़े हो गए हैं। हमारे लिए सगाई का नारियल कौन लाएगा ? चूड़ा ने राजपुरोहित को कहकर वह नारियल महाराणा को दिलवा दिया। मंडोर के महल में हाहाकार मच गया। किन्तु अब क्या किया जा सकता था। सगाई का नारियल तो दिया जा चुका था। तब मंडोर के महाराजा ने कहा मेरी राजकुमारी से जो कुंवर जन्मेगा, वहीं मेवाड़ का भावी महाराणा होगा। चूड़ा के वंशज मेवाड़ की गद्दी के लिए दावा न कर सके इसके लिए चूड़ा को मेवाड़ को त्यागना होगा।

भारत के राजपूतों के इतिहास में चूड़ा अकेले ऐसे युवराज हैं, जिन्होंने अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए राजगद्दी का त्याग किया और मेवाड़ से स्व निर्वासन ले लिया। चूड़ा ने मेवाड़ में तभी प्रवेश किया जब महारानी हंसा ने उन्हें चित्तौड़ की रक्षा के लिए बुलाया। चूड़ा ने चित्तौड़ की रक्षा की और महारानी हंसा के कुंवर मोकल को चित्तौड़ की राजगद्दी पर बिठाया। महारानी हंसा ने मेवाड़ राज्य के अभिभावक के रूप में चुड़ा से मेवाड़ में ही रहने का आग्रह किया और चुड़ा को कोठारियां की बड़ी जागीर दी गई।

इन्हीं चुड़ा के पुत्र थे जग्गा। वे भी अपने पिता की भांति वीर, त्यागी और देशभक्त थे। महाराणा सांगा ने जब खानवा के मैदान में सन् 1526 में मुगल राज्य के संस्थापक बाबर से युद्ध किया तब वीर जग्गा ने इस युद्ध में वीरता दिखाते हुए वीर गति प्राप्त की। इससे प्रसन्न होकर जग्गा के पुत्र वीर पत्ता को केलवा की जागीर दी गई। वीर पत्ता ने केलवा में अपनी कुलदेवी का मंदिर बनवाया। अपने कुल की सतियों के देवल बनवाए। अपने वीर पूर्वजों के पगलिए स्थापित किए। स्नान के लिए जल कुण्ड बनवाया। रावले के बाहर चौक में छतरी बनवाई। पन्नाधाय जब कुंवर उदयसिंह को सुरक्षित बचाकर कुंभलगढ़ ले आयी। किलेदार आशाशाह देवपुरा के संरक्षण में कुंवर उदयसिंह युवा हुए। पाली के राजा अक्षयराज सोनगरा चौहान अपनी दोहित्री जयवन्ता कुंवरी की सगाई के लिए कुंभलगढ़ आए। सोनगरा ने कहा कि यदि थाली में साथ बैठकर भोजन कर लेंगे तो में मान लूंगा कि यहीं असली उदयसिंह हैं और अपनी दोहित्री की सगाई कर दूंगा। दोनों चुण्ड़ावत भाईयों ने कुंवर उदय सिंह की शादी जयवन्ता कंवर से हुई। सन् 1540 में कुंभलगढ़ में महाराणा प्रताप का जन्म हुआ। सन् 1546 में वीर पत्ता के नेतृत्व में सेना ने कुंवर उदयसिंह को चित्तौड़ की गद्दी पर बिठाने के लिए कूच किया। बनवीर की सेना से पहला मोर्चा देवारी में हुआ। वहां से हारकर भागी बनवीर की सेना ने मावली से मोर्चा लगाया। मावली से हारकर बनवीर की सेना चित्तौड़ पहुंची। वीर पत्ता ने चित्तौड़ के युद्ध में निर्णायक जीत हासिल की। बनवीर किले की खिड़की से कुदकर प्राण बचाने के लिए महाराष्ट्र की ओर भाग गया। वीर पत्ता ने कुंवर उदयसिंह को चित्तौड़ की गद्दी पर बिठाया। सन् 1549 से 1566 तक महाराणा उदयसिंह चित्तौड़ पर राज्य करते रहे। सन् 1567 में अकबर ने चित्तौड़ के किले पर घेरा डाला। महाराणा उदयसिंह ने चित्तौड़ की रक्षा का भार जयमल राठौड़ और वीर पत्ता को सौंपा और अपने नए ससुराल राजपिपला गुजरात चले गए। लगभग 7 माह तक अकबर चित्तौड़ पर डेरा डाले रहा। एक रात जयमल राठौड़ तोप के गोलों से टूट चुकी किले की बुर्ज की मरम्मत करवा रहे थे। तब अकबर की बन्दूक की गोली जयमल की पिण्डली में लगी। दुर्ग चारों ओर से मुगल सेना से गिरा हुआ था। लम्बे समय तक चले संघर्ष के कारण सेना में सैनिकों की संख्या कम हो गई थी। अगली सुबह वीर पत्ता ने जयमल राठौड़ को अपने कंधे पर बिठाया, दोनों ने अपने दोनों हाथों में तलवारें थामी और निकल पड़े दुर्ग से बाहर, मुगल सेना की ओर बढ़ते हुए तलवार चलाकर मुगल सैनिकों को गाजर मूली की तरह काटने लगे। उनका युद्ध कौशल देखकर अकबर चकित रहे गया, उसने बीरबल से कहा तुम हिन्दुओं से चारभुजा नाम का देवता हैं, कहीं वो ही तो आकर मेरे सैनिकों को नहीं काट रहा हैं ? उस दिन युद्ध करते हुए चित्तौड़ की भैरव पोल पर जयमल राठौड़ और वीर पत्ता वीरगति को प्राप्त हुए। जहां जयमल राठौड़ और वीर पत्ता का बलिदान हुआ वहां अकबर ने दोनों के स्मृति स्मारक के रूप में दो लाल पत्थर गड़वा दिए। अकबर ने अपने अकबर नामे में लिखा हैं कि -‘‘मेरा बहुत सी हिन्दु सेनाओं से सामाना हुआ हैं किन्तु जयमल राठौड़ और वीर पत्ता जैसे योद्धा मैंनें कहीं नहीं देखें।’’

हल्दीघाटी युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने जग्गा के युवराज को केलवा से बड़ी आमेट की जागीर देकर चूड़ा वंश के त्याग और बलिदान और वीरपत्ता की वीरता का सम्मान किया। तब से चुण्डावतों का जग्गावत राजवंश आमेट के ठिकानेदार हैं। कोठारिया, केलवा और आमेट में जहां चुण्डावत वंश के वीरों के पद चिन्ह हैं। वहां इतिहास ने अपने आपको दोहराया हैं। कोठारिया राजवंश के शिवदान सिंह जहां राज्य मंत्री रहे, वहीं वर्तमान में कल्याणसिंह चौहान वरिष्ठ विधायक हैं। आमेट के रावत गोविन्द सिंह विधायक रहे तो केलवा के हरिओम सिंह राठौड़ राजसमंद के लोकप्रिय सांसद हैं और आगरिया आमेट के सुरेन्द्रसिंह राठौड़ कुंभलगढ़ से तीन बार विजयी रहे, वर्तमान में वे राजसमंद जिले के वरिष्ठतम विधायक हैं।

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