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56 इंच वाले फिट, पर देश अनफिट

देश में एक साल में भूख से हो गईं 20 मौतें

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बाबूलाल नागा 

मोदी सरकार देश में ‘हम फिट तो देश फिट‘ अभियान का स्वांग कर रही है। मोदी जी का सीना तो पहले ही 56 इंच का है, पर फिर भी उन्होंने अपनी फिटनेस का वीडियो बनाकर शेयर कर दिया। देश की जनता को जताया कि देखिए मैं कितना फिट हूं पर उनका क्या जो फिट नहीं थे। पिछले एक साल में देश में 20 ऐसे लोगों की मौत हो गई जो भूखे थे और सरकार उनकी फिटनेस का जरा सा भी ख्याल नहीं रख पाई। अगर रखती तो उन्हें राशन मिल पाता और आज वे इस दुनिया में सांस ले रहे होते। सरकार व उनके मंत्री तो अपनी-अपनी फिटनेस के वीडियो बनाकर एक दूसरे को चैंलेज देने में जो व्यस्त हैं।

झारखंड राज्य के देवघर के 60 वर्षीय रूपलाल मरांडी की 23 अक्टूबर 2017 को भूख से मौत हो गई। रूपलाल और उनकी बेटी राशन दुकान में आधार-आधारित बायोमेट्रिक सत्यापन नहीं करवा पाए। इस कारण उनके परिवार को दो महीने से राशन नहीं मिल रहा था। दलित समुदाय के नारायण की मौत 7 जुलाई 2017 को हुई। उन्हें छह महीनों तक राशन नहीं मिला क्योंकि उनका राशन कार्ड आधार से जुड़े न होने के कारण रद्द हो गया था। साल 2017 के नवंबर महीने में भुखमरी की शिकार होने वाली अल्पसंख्यक समुदाय की महिला सफीना अशफाक और ओडिशा के बरगड़ जिले के ओबीसी समुदाय के कुंदरू नाग की कहानी इससे अलग नहीं है। कुंदरू नाग की मौत 18 जून 2018 को हुई। कुंदरू और उनके पति को राशन नहीं मिला क्योंकि वे वृद्वावस्था और बीमारी के कारण पंचायत भवन तक नहीं जा पाए जबकि साल 2017 के नवंबर महीने में भुखमरी के कारण मौत की शिकार हुई सकीना बीमारी के कारण आधार-आधारित बायोमेट्रिक सत्यापन के लिए राशन दुकान नहीं जा पाई थी।

Source NDTV

भूख के कारण जो भी मौतें हुई हैं, वे परिवार या स्वयं मृतक सरकारी उदासीनता का शिकार हुए। झारखंड की 45 वर्षीय मीना मूसहर के पास न राशन कार्ड था और न ही घर। वह कचरा बीनकर अपना गुजारा करती थीं। उन्हें अक्सर लोगों से खाना मांगना पड़ता था। मौत के चार दिन से पहले उन्होंने अन्न का एक दाना तक नहीं खाया था। हालत बिगड़ने पर वह उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। झारखंड की ही 55 वर्षीय सावित्री देवी द्वारा कई बार आवेदन करने के बाद भी उनके परिवार का राशन कार्ड नहीं बन पाया। वर्ष 2014 में उनकी विधवा पेंशन स्वीकृत हुई पर उसकी पहली किश्त अप्रैल 2018 में ही हस्तांतरित हुई क्योंकि उनका बैंक खाता आधार के साथ जुड़ा नहीं था। ग्रामीणों के मुताबिक सावित्री देवी ने तीन दिनों से कुछ नहीं खाया था। वह भीख मांग कर अपना पेट भरती थीं।

रोजी रोटी अधिकार अभियान के मुताबिक पिछले एक वर्ष में देशभर में कम से कम 20 लोगों की भूख से मौतें हुई हैं। झारखंड में 12, कर्नाटक में 3, उत्तरप्रदेश में 3 और ओडिशा में 2 मौतें हुईं। मृतकों में 11 वर्षीय संतोषी कुमारी से लेकर 67 वर्षीय एतवरिया देवी शामिल हैं। कम से कम 11 मामलों में आधार संबंधित विफलता का भूख में सीधा योगदान था। भूख के सारे शिकार दलित, आदिवासी, अन्य पिछड़ी जाति या मुस्लिम समुदाय से हैं। सब मामलों में सस्ते अनाज और सामाजिक सुरक्षा पेंशन न मिलने के कारण मृतक को कई दिनों के लिए खाना नहीं मिल पाया। देश के कई राज्यों में भूख से मौत हुई है पर केंद्र सरकार की ओर से पेश 2018-19 के बजट में भूख या कुपोषण का कोई उल्लेख नहीं है। झारखंड में हाल ही में हुई भुखमरी से मौतों से जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) की अहमियत उजागर होती है। राज्य में लाखों परिवार भूख की कगार पर रह रहे हैं और जन पीडीएस उनके लिए जीवन की डोर की तरह है। एक हल्के से झटके से यह डोर टूट सकती है और इनको भुखमरी का सामनाकरना पड़ सकता है। पिछले साल जब पीडीएस में आधार द्वारा अंगूठे का सत्यापन अनिवार्य किया गया, कई लोगों को भुखमरी से जूझना पड़ा है।

देश में भूख से मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। देर-सवेर ऐसे मामले सामने आते रहते हैं और सरकारें इन मामलों को गंभीरता से लेने की बजाय खुद को बचाने के लिए लीपा-पोती में लग जाती हैं, जो बेहद शर्मनाक है। देश की सरकारें तमाम कोशिशों के बाद भी लोगों को भरपेट भोजन तक नहीं दे पा रही है। आधार से नहीं जुड़े होने के कारण कई लोगों की पेंशन बंद हो गई है। अनेक बुजुर्ग, जिनका बायोमेट्रिक मैच नहीं करता, वे राशन, पेंशन से वंचित हो जाते हैं। सितंबर 2017 से जनवरी 2018 तक देश के तीन राज्यों में कम से कम दस लोगों की आधार के कारण भूख से मौत हो गई है।

दरअसल, भूख से मौत की समस्या सिर्फ हमारे देश में ही नहीं है, बल्कि यह आज पूरी दुनिया में फैली हुई है। हालत यह है कि दुनियाभर में भूख से जुझने वाले लोगों की तादाद 12 करोड़ 40 लाख हो गई है। भारत की स्थिति काफी चिंताजनक है। गरीबी व भुखमरी में 119 देशों में भारत 100वें नंबर पर है। पिछले साल 97वें नंबर पर था। भारत देश उत्तरी कोरिया, बांगलादेश व इराक से भी पीछे हैं। संतोष की बात यह है कि भारत पाकिस्तान से आगे हैं। यह समस्या कुपोषण की समस्या से जुड़ी है। इसके लिए सामाजिक क्षेत्र में प्रतिबद्वता की जरूरत है। भुखमरी को दूर करने में अन्य देशों ने अपनी स्थिति को सुधारा है। भारत के पड़ौसी देश चीन का 29वां नंबर है। नेपाल 72 नंबर पर, म्यांमार 77 व श्रीलंका 84 और बांगलादेश 88 नंबर पर है। पाकिस्तान 106 व अफगानिस्तान 107वें नंबर पर है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स यानि विश्वव्यापी भुखमरी सूचकांक को नापने के लिए चार मानदंड है। कुपोषण बच्चों की मृत्युदर, बच्चों की लंबाई व वजन के आधार पर यह तय होता है। इन चारों मापदंड़ों पर भारत की स्थिति अत्यंत खराब है। जिन आंगनबाड़ियों के भरोसे इन चारों मानदंडों को छोड़ रखा ह,ै वे आंगनबाड़ियां अत्यंत दयनीय स्थिति में हैं। वस्तुतः भुखमरी को दूर करने के लिए जो प्रतिबद्वता सरकार के काम में नजर आनी चाहिए वह कहीं दिखाई नहीं देती है।

वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ ने भूख से हो रही इन मौतों को लेकर सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी की है। उनका कहना है कि भारत में पच्चीस करोड़ लोग खाद्य सुरक्षा से वंचित है। हिंदुस्तान की 14 फीसदी आबादी को भरपूर आहार नहीं मिलता। वे कुपोषण के शिकार है। भारत का 21 प्रतिशत बचपन गंभीर कुपोषण से जूझा रहा है। पांच साल से कम उम्र के 38 प्रतिशत बच्चे शारीरिक तौर पर कम विकसित है। 51 फीसद औरतें खून की कमी से दो चार है। इसके बाद भी ‘हम फिट तो इंडिया फिट‘ की बात की जा रही है।

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