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बामणिया बंजारा समाज में ऐसे मनाया जाता है गणगौर पर्व

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अमर बंजारा/गंगापुर/भीलवाड़ा

राजस्थान विभिन्न संस्कृति एवं लोक त्यौंहारों का राज्य है। यहां की विभिन्न जातियां अपनी एक अभिन्न संस्कृति लिये हुए हैं। भारत में बंजारा समाज की उत्पत्ति भी राजस्थान से होना माना गया है। इस समाज की अपनी एक अलग संस्कृति है, अलग परम्पराएं है। वैसे तो हिन्दुओं के सभी त्योंहार मनाए जाते हैं लेकिन इस समाज में गणगौर के त्योंहार को विशेष रूप से मनाया जाता है।

प्रतिवर्ष चैत्र सुदी के कुछ दिन पहले से ही शुभ दिन को टांडे (गांव) की बालाएं नायक (मुखिया) के घर शाम को एकत्र होकर गीत गाती हुई प्रतिदिन अलग-अलग खेतों में पहुंचती है। खेतों से मिट्टी लेकर वे प्रतिदिन मिट्टी के गुड्ढे-गुडढी (खिलौने) शिव-पार्वती के प्रतीक बनाकर अलग-अलग बालिकाओं को देती है। जिसे ’’पांति’’ कहा जाता है। तीज के दिन प्रातः कन्याएं नायक के घर एकत्रित होकर वहां से जंगल में जाती है और लकड़ियां काटकर लाती है फिर किसी तालाब या कुए पर मिट्टी से ’’इसर’’ और ’’पार्वती’’ की प्रतिमा तैयार करती है जिसे गहने और परिधान पहनाकर ’’कसार’’ (सतु) से पूजन करती है। पीपल के पेड़ को साक्षी बनाकर इसर और पार्वती को सात फेरे दिलाती है। ऐसी मान्यता है कि जो कंवारी कन्या इसर और पार्वती की प्रतिमा को सिर पर रख कर ले जाती है उसकी शादी शीघ्र हो जाती है। प्रतिमाओं के फेरे कराने के बाद गीत गाती हुई लोकनृत्य प्रस्तुत करती है और गीत गाते हुए टांडे में ले जाया जाता है। टांडे में प्रत्येक परिवार से एक सदस्य थाली में पकवान और पानी का लौटा लेकर पहुंचता है और एक कंवारी कन्या को देकर गणगौर की पूजा करवाकर उसे उपवास खोलने हेतु उसके घर ले जाता है। इस प्रकार सभी सदस्य एक एक कन्या को अपने-अपने घर भोजन कराने ले जाते हैं। रात को फिर सभी महिलाएं एकत्रित होती हैं एवं प्रतिमाओं (गणगौर) को बीच में रखकर चारों और गीत गाते हुए लोकनृत्य करती हैं।

चार-पांच दिन तक प्रातः, दोपहर एवं सायं को नायक के घर गणगौर की महिलाओं द्वारा पूजा की जाती है एवं गणगौर के गीत गाती हुई बालिकाएं नृत्य करती है। अन्त में शुभ दिन की शुभ वेला में इन प्रतिमाओं को जल में विसर्जित कर दी जाती है।

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