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झूठी है नरबलि की खबर, दैवीय चमत्कार नहीं भोपाओं की ट्रिक्स है ये

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लखन सालवी

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक फोटो वायरल हुआ। फोटो में कुछ लोगों के चेहरे दिख रहे है और एक सफेद चादर के बीच एक थाली में एक बालक का मुण्ड दिख रहा है। सोशल मीडिया पर एक फोटो को शेयर करते हुए फेसबुकियों ने अपने-अपने हिसाब से इस फोटो की व्याख्याएं व टिप्पणियां की। चंद घंटों में यह फोटो देश भर में फैल गया। जिसने भी इस फोटो को देखा वो आक्रोशित हुआ और गुस्से में तिलमिलाते हुए उसने टिप्पणी की, ये लाजमी भी है।

चिंताजनक बात यह है कि सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले अथवा सोशल मीडिया को उपयोग करने वाले ज्यादातर लोग ऐसे फोटो, कंटेंट या कथ्य को ही सत्य मानकर उलजलूल बातें सोशल मीडिया पर दनादन शेयर कर देते है। इस दौर में सर्वाधिक जरूरत पड़ने लगी है ऐसी अफवाहों की पड़ताल की।

फेसबुक, व्हाट्सएप्प, इंस्टाग्राम आदि सोशल साइट्स पर शेयर की गई ये फोटो राजस्थान के भीलवाड़ा जिले की सहाड़ा तहसील के खांखला गांव की है। खांखला ग्राम पंचायत मुख्यालय भी है। यह गांव भोपों की जादूई कलाओं के कारण प्रसिद्ध है।

इस घटना को मैंनें 14 साल पहले देखा था –

मेरे गांव से 15 किलोमीटर दूर खांखला गांव के भोपाओं की जादूई कलाओं के बारे में करीब 14 साल पहले मुझे मेरे ही गांव के भैरू सिंह जी सोलंकी (टेंट वाले) ने बताया था। हांलाकि भैरू सिंह जी ने भोपों में जादूई कला की बजाए चमत्कार, अदृश्य व अलौलिक शक्ति होना बताया। मुझे उनकी बताई बातों पर विश्वास नहीं हुआ तो वे मुझे अपनी बाइक पर बिठाकर प्रत्यक्ष प्रमाण देने के लिए अपने साथ खांखला ले गए। वहां एक भोपे के घर में गए। बड़े दरवाजे वाले मिट्टी के मकान की पोल (बरामदे) में एक बुजुर्ग व्यक्ति चारपाई पर लेटा हुआ था।

भैरू सिंह जी ने उसे आवाज दी – धोक भोपा जी।

भोपें ने आंखें खोली और चारपाई से उठते हुए कहा – ओ… हो… भैरू सिंह जी। आज दोपहर में कैसे आना हुआ ? आज तो घर में कोई है भी नहीं। आप के लिए चारपाई बिछाने वाला भी कोई नहीं है, किसे कहूं ?

पोल में ही दिवार के सहारे एक चारपाई खड़ी हुई थी। भोपा ने खड़ी हुई चारपाई की ओर हाथ करके झटका दिया, तो चारपाई बिछ गई।
मेरे लिए ये अविश्वसनीय था। लेकिन ये सब कुछ हुआ तो मेरी आंखों के सामने ही था। बिल्कुल वैसे ही जैसे एक जादूगर 7 ब्लैड और धागा निगलता है और फिर एक धागे में बंधी हुई ब्लैड एक-एक कर मूंह से बाहर निकालता है। हम इस जादू को देखते है मगर समझ नहीं पाते है। ठीक वैसे ही मैं चारपाई के बिछ जाने की घटना को समझ नहीं पाया। पूछने की कोशिश भी लेकिन भैरू सिंह जी ने भोपों के करिश्मों की कहानियां सुना-सुना कर हिप्नोटाइज कर दिया था, सो मैं भोपें से थोड़ा डरा हुआ था।

प्रतीकात्मक नेजा

भैरू सिंह जी ने यह भी बताया कि इस गांव में नवरात्रा के आखिरी दिन नेजा (नवरात्रा विसर्जन शोभायात्रा) निकलता है तथा उस दौरान भोपाओं द्वारा बड़े-बड़े चमत्कार बताए जाते है। बड़ी उत्सुकता थी इसलिए अगले नवरात्रा पर मैं पहुंच गया खांखला। सामने दृश्य यूं था –
एक मंदिर के बाहर एक लम्बे बांस पर नेजा बंधा हुआ था। जिसके चारों कोनों में चार तलवारें लटक रही थी। तलवारों पर सिंदूर से गोल-गोल डॉट लगे हुए थे। तीन लोग उसे पकड़कर खड़े थे। मंदिर के सामने मोहल्ले में सड़क के दोनों ओर सैकड़ों श्रद्धालु खड़े थे। कई भोपा खेल रहे थे, उन्हें भाव आ रहे थे। वे थरथर कांप रहे थे। कोई लोहे की सांकल को लेकर तेज आवाज में चिल्लाते हुए सांकल को अपनी पीठ पर मार रहा था तो कोई तलवार लहराते हुए हो-हो, हा – हा कर रहा था। एक भोपा के दोनों कानों में नींबू लटक रहे थे। मुख्य भोपा की जबान दो इंच बाहर थी तथा उसमें त्रिशुल आर-पार दिखाई दे रहा था। इस नजारे को आप मुर्हरम के दौरान मलंगों द्वारा दिखाए जाने वाले करतब जैसा महसूस कर सकते है। कुछ देर बाद मंदिर से चार लोग बाहर निकले। चारपाई के चारों पायों को उन्होंने अपने कंधों पर ढो रखा था। चारपाई पर एक सफेद चादर बिछी हुई थी जो चारपाई के चारों ओर नीचे तक लटकी हुई थी। चादर पर एक थाली थी, जिसमें एक बालक का मुण्ड (सिर) दिखाई दिया। उसकी आंखें बंद थी। चारपाई के मंदिर से बाहर आते ही महिला-पुरूष जय-जयकार करने लगे। आगे-आगे लोग नेजा लेकर चल रहे थे उसके पीछे कुछ भोपाओं के बीच चारपाई थी, और पीछे श्रद्धालु चल रहे थे। करीब दो किलोमीटर की पैदल यात्रा खांखला के तालाब पर जाकर रूकी। वहां भोपाओं ने फिर भाव किए श्रद्धालुओं ने उनके धोक लगकर आने वाले साल में बारिस, फसलों व स्वास्थ्य को लेकर सवाल किए। भोपों ने भविष्यवाणियां की और फिर यात्रा पुनः मंदिर की ओर रवाना हुई। चारपाई को मंदिर में ले जाया गया, चारपाई के साथ मंदिर का मुख्य भोपा भी अंदर गया और कुछ देर बाद एक लड़का बाहर आया, इसका सिर वही था जो चारपाई पर थाली में पड़ा हुआ था।

मैं भोपा से मिलकर बातचीत करना चाह रहा था लेकिन न तो भोपा ने बात की और ना ही दूसरे लोग सच्च बता पाए। कुछ ग्रामीणों ने बताया कि भोपे में माता जी आते है और वो चमत्कार दिखाते है। मंदिर में बालक का सिर काटा जाता है, सिर को थाली में रखकर चारपाई पर रखा जाता है तथा धड़ मंदिर में पड़ी रहती है। तालाब से लौटकर माताजी के चमत्कार से भोपा सिर व धड़ को पुनः जोड़े देता है।

लोगों ने बताया कि मंदिर से लेकर तालाब तक रास्ते में जमीन में एक चांदी का तार गड़ा हुआ है, चारपाई को इस रास्ते पर ही ले जाया जाता है, अगर उस तार की परिधी से इतर चारपाई को ले जाया जाता है तो बालक के प्राण पखेरू उड़ जाते है। ऐसी ही कई किवंदतियां क्षेत्र में प्रचलित है।

ये है सच्चाई –
दरअसल 14 साल बाद जब दूसरी बार इस घटना को सोशल मीडिया पर देखा तो इसकी सच्चाई की तह तक जाने का विचार किया। खांखला गांव के कई शिक्षित लोगों से बात की। उन्होंने बताया कि भोपाओं के पास ट्रिक्स है, जिनका प्रदर्शन देखकर लोग उन्हें चमत्कार मानते है। खांखला के भोपाओं के पास तलवार की नोंक पर एक क्विटंल पत्थर की चट्टान को लटकाने, जीभ में से त्रिशुल को आर-पार करने, सिर को धड़ से अलग करने, दोनों कानों में नींबू लटकाने सहित ऐसी कई ट्रिक्स है।

फेसबुक, व्हाट्सएप्प, इंस्टाग्राम आदि सोशल साइट्स पर शेयर की गई ये फोटो राजस्थान के भीलवाड़ा जिले की सहाड़ा तहसील के खांखला गांव की है। खांखला ग्राम पंचायत मुख्यालय भी है। यह गांव भोपों द्वारा बताई जाने वाली जादूई कलाओं के कारण प्रसिद्ध है।

सिर को धड़ से अलग करने की ट्रिक्स
इस ट्रिक्स में एक नवार वाली चारपाई का उपयोग किया जाता है। चारपाई पर नवार की दो परतें होती है। दोनों परतों के बीच बालक को सेट कर दिया जाता है। उसके सिर को उपर वाली नवार से होते हुए बाहर निकाला जाता है तथा गर्दन के आकार के छेद वाली थाली से सिर को उपर निकाल दिया जाता है। थाली में लाल रंग डाल दिया जाता है ताकि वो खून जैसा दिखाई दे।

कटे सिर की फोटो वायरल होने के बाद भीलवाड़ा जिले की पुलिस ने भी इस पूरे प्रकरण की पड़ताल कर ली है। सामने यही आया है कि यह ट्रिक्स है तथा नरबलि जैसा कोई कृत्य नहीं है।

हां, भोपाओं द्वारा इस प्रकार की ट्रिक्स दिखाना अंधविश्वास को फैलाने वाला कृत्य है। मैंनें 14 साल पहले इस घटना को देखा, मुझे सिर काटने की बात पर एकाएक विश्वास तो नहीं हुआ लेकिन इसके संदर्भ में मेरे पास कोई तर्क नहीं थे। 14 साल तक कहीं ना कहीं मैं भी इसे भोपाओं का चमत्कार मानता रहा और भोपाओं से डरता रहा, लेकिन अब जाकर सच्चाई सामने आई है कि ये ट्रिक्स है।

तो खांखला गांव में नरबलि की खबर पूर्ण रूप से असत्य है। यहां के भोपा कई ट्रिक्स बताकर दैवीय चमत्कार का अंधविश्वास फैलाते है। हालांकि क्षेत्र के बुजुर्ग लोग भोपाओं की पोप लीला को जानते है मगर बच्चे, युवा व महिलाएं अंधविश्वास कर लेते है। वहीं मेरी तरह कई युवा बरसों तक अज्ञान के घेरे में रह जाते है। जादू को जादू बताकर ही उसका प्रदर्शन करना चाहिए, दैवीय चमत्कार बताकर जनता को अंधविश्वास में रखकर चमत्कार बताना सर्वथा अनुचित है।

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