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हैप्पी फिर भाग जाएगी : फिल्म समीक्षा

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समय ताम्रकर –

बॉलीवुड फिल्मों के ज्यादातर सीक्वल निशाने पर नहीं लगते। ’हैप्पी भाग जाएगी’ का सीक्वल ’हैप्पी फिर भाग जाएगी’ पहली फिल्म की परछाई मात्र साबित हुआ है। फिल्म से कुछ उम्दा लोगों के नाम जुड़े हुए थे जिससे उम्मीद जागी थी कि यह सीक्वल सिर्फ पहले भाग की सफलता को भुनाने के लिए नहीं बनाया होगा, लेकिन फिल्म शुरू होने के दस मिनट बाद ही यह आशा, निराशा में बदल जाती है।

हैप्पी पहली फिल्म में पाकिस्तान पहुंच गई थी, इस बार चीन को चुना गया है। एक हैप्पी (डायना पेंटी) के साथ दूसरी हैप्पी (सोनाक्षी सिन्हा) भी आ मिली है। दो हैप्पी होंगी तो कन्फ्यूजन तो होगा ही, बस इसी बात के आसपास कहानी घूमती रहती है।

हैप्पी (सोनाक्षी सिन्हा) चीन में उस इंसान से बदला लेने आई है जो उसके साथ शादी तोड़ देता है। उसी समय चीन में दूसरी हैप्पी (डायना पेंटी) भी अपने पति गुड्डू (अली फज़ल) के साथ मौजूद है। हैप्पी के जरिये चीनी माफिया पाकिस्तान से अपना कुछ काम करवाना चाहते हैं और वे भूल से उस हैप्पी का अपहरण कर लेते हैं जिसकी उन्हें जरूरत नहीं है। अपने इस काम को अंजाम देने के लिए चीनी माफिया भारत से बग्गा (जिमी शेरगिल) और पाकिस्तान से अफरीदी (पियूष मिश्रा) को भी उठवा कर चीन ले आते हैं। मिस्टेकन आइडेंटीटीज़ का फॉर्मूला यहां लगाया गया है, लेकिन यह काम नहीं कर पाया।

फिल्म की कहानी और स्क्रिप्ट पर मेहनत नहीं की गई है। मनोरंजन के नाम पर दिमाग को घर पर भी रख कर आए तो भी यह फिल्म मनोरंजन नहीं करती। फिल्म के लेखक और निर्देशक मुदस्सर अजीज़ पिछली फिल्म के चुटकलों को ही यहां दोहराते नजर आए। उन्होंने लोकेशन बदल कर पूरी फिल्म चीन में बना कर दर्शकों का ध्यान बंटाने की कोशिश की है, लेकिन कामयाब नहीं हो पाए।

फिल्म की कहानी में कोई दम नहीं है और कई सवालों के जवाब नहीं मिलते। स्क्रिप्ट में भी ऐसी बात नहीं है कि यह लगातार हंसाती रहे। कुछ वन लाइनर और कुछ सीन जरूर मजेदार हैं। चीनी को हिंदी बोलते या गाने गाते देखना अच्छा लगता है, लेकिन इस तरह के संवाद और दृश्यों की संख्या बहुत कम है।

’हैप्पी फिर भाग जाएगी’ की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह फिल्म दर्शकों से कनेक्ट नहीं हो पाती। दर्शकों को हंसाने की भरपूर ’कोशिश’ साफ दिखाई देती है इसलिए मजा नहीं आता। एक ही चुटकुले को बार-बार खींचा गया है जिससे मनोरंजन का झरना बहुत जल्दी सूख जाता है। आखिर कब तक ’तेरा भाई’ या खुशी (जस्सी गिल) को ’शॉक’ लगने पर बड़बड़ाने वाले सीन पर बार-बार हंस सकते हैं। ’मा का जू’ या ’फा क्यू’ जैसे नामों पर कैसे ठहाका लगाया जा सकता है?
शुरुआती आधे घंटे के बाद फिल्म का ग्राफ लगातार नीचे की ओर आता है और आखिरी के 45 मिनट में तो फिल्म उबाऊ हो जाती है। क्लाइमैक्स भी थका हुआ है।

मुदस्सर अजीज़ ने निर्देशक के रूप में अपने लेखन की कमियों को छिपाने की कोशिश की है, लेकिन सफल नहीं हो पाए। उन्होंने फिल्म के दो नए किरदारों (सोनाक्षी सिन्हा और जस्सी गिल) पर ज्यादा फोकस किया है और अली फज़ल, डायना पेंटी, पियूष मिश्रा, जिमी शेरगिल पर कम ध्यान दिया है। यह प्रयोग असफल रहा है क्योंकि दर्शकों को पुराने किरदारों को देखने में ज्यादा दिलचस्पी थी। पियूष और जिमी ज्यादातर दृश्यों में नजर आते हैं, लेकिन उनके पास करने को कुछ नहीं रहता।

(साभार – वेब दुनिया)

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