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बेलगाम नेताओं की बदजुबानी

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बाबूलाल नागा

देश के लोकतांत्रिक इतिहास में 17वीं लोकसभा का चुनाव नेताओं की ओर से भाषणों में अभद्र शब्दों के इस्तेमाल के लिए जाना जाएगा। इस बार चुनाव के दौरान जिस तरह के बोल, भाषण और धमकियां चल रही हैं, उससे राजनीतिक मर्यादाएं तार-तार हो रही हैं। चुनावी सभाओं के दौरान नेताओं की भडकाऊ भाषणबाजी और एक दूसरे पर बदजुबानी थमने का नाम नहीं ले रही है। एक दूसरे पर निजी हमले इतने आम हो गए हैं कि नेता प्रचार में इस बात का भी ख्याल नहीं कर रहे हैं कि उनका प्रतिद्वंदी पुरुष है या महिला। कोई महिला नेताओं के अधोवस्त्रों के रंग का सार्वजनिक बयान दे रहा है तो कोई सार्वजनिक मंच से ऐसी गाली दे रहा है जिसकी कल्पना किसी सभ्य आदमी से नहीं की जा सकती है। कोई अली और बजरंगबली के नाम पर वोट मांग रहा है। कोई नेता भारत की सेना को किसी राजनेता की सेना बता रहा है। और उस सेना के पराक्रम पर वोट मांगे जा रहे हैं। कोई चौकीदार को चोर बता रहा है तो कोई चौकीदार को चोर बताने वाले के पूरे खानदान को चोर बताने में लगा है।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में हो रहे आम चुनाव पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। अब तक लोकसभा के चार चरण हो चुके हैं लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान नेता एक दूसरे पर जिस तरह से बरस रहे हैं और आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं, उससे भारतीय लोकतंत्र की छवि भी बिगड़ रही है। भारत का राजनीतिक विमर्श कभी भी इतना अश्लील नहीं रहा है जितना कि 17वीं लोकसभा के चुनाव प्रचार में देखा जा सहा है। नेताओं ने भाषा का स्तर बहुत गिरा दिया है। अपने विरोधी का अपमानित करना और अपने समर्थकों को भी इसके लिए प्रेरित करना आम चलन हो गया है। जाति-धर्म के नाम पर भड़काऊ भाषण दिए जा रहे हैं। धर्म के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं। यहां तक कि नियम कानून और आचार संहिता की भी उन्हें परवाह नहीं। फेंकू और मां -बेटे के लिए काम में लिए जा रहे ऐसे शब्दों का प्रयोग रैलियों में होने लगा जिनके प्रयोग से कोई भी सभ्य व्यक्ति आम बोलचाल में भी परहेज बरतता है।

राजनीतिक पार्टियों को भी इनकी शिकायतें पहुंच रही हैं लेकिन इन नेताओं की पार्टी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। ऐसा लगता है कि चुनाव आचार संहिता के उल्लघंन के तहत मुकदमे दलों और नेताओं के लिए महज मजाक बनकर रह गए हैं। हर पार्टी ऐसे विवादित बयान से पल्ला झाड़ लेती है और कह दिया जाता है कि पार्टी बयान से सहमत नहीं है। न समाजवादी पार्टी ने आजम खान पर कोई कार्रवाई की और न ही कांग्रेस ने नवजोत सिंह सिद्दू पर। नेता और उम्मीदवार भडकाऊ भाषण देकर माहौल बिगाड़ने का प्रयास कर रहे हैं और उनकी पार्टियां चुप्पी साधे हुए हैं। इस बीच भड़काऊ और शर्मसार कर देने वाले बयानों पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को भी फटकार लगाने का काम किया जिसके बाद चुनाव आयोग को अपनी शक्तियों का मानों भान हुुआ और वह फुल फाॅर्म में नजर आ गया। इसके बाद तो चुनाव आयोग ने बड़ी कार्रवाई करते हुए एक ही दिने में चार दिग्गज नेताओं के चुनाव प्रचार पर प्रतिबंध लगाकार सभी को चैंका दिया। पर केवल चुनाव प्रचार में शामिल होने पर कुछ घंटे के लिए रोक लगा देना महज औपचारिकता सी लगती है।

बहरहाल, एक तरफ जहां इस प्रकार की राजनीतिक बयानबाजी राजनेताओं के गिरते स्तर को दर्शाता है। वहीं दूसरी तरफ नेताओं की ऐसी बयानबाजी के बीच मुद्दे पीछे छूट रहे हैं। चुनाव का एजेंडा भ्रष्टाचार, महंगाई, सांप्रदायिकता, विकास, रोजगार और राष्ट्रीय और सामाजिक सुरक्षा न होकर व्यक्तिगत हमले हो गया है। चुनाव आरोप प्रत्यारोप पर केंद्रित हो गए हैं। लोकतंत्र में सभी को अपनी बात कहने का अधिकार है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मर्यादा का पालन ही नहीं किया जाए।

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