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हिमालय का कब्रिस्तान : क्या हम सब तबाही की एक और नयी तारीख का इंतजार कर रहे है ?

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**लखन सालवी**
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दो दिन पहले गोगुन्दा (उदयपुर) से रवाना होकर केदारनाथ पहुंच गया, और फिर वहां से रवाना होकर कश्मीर होते हुए काठमाण्डू . . .। तीनों ही स्थल इस विश्व के सुन्दरतम स्थल है . . . है ना . . . आपके नजरिये से भी ? मैंनें भी सुन रखा था, पढ़ रखा था और कई चित्र देख रखे थे इन तीनों स्थलों के। वाकई सुन्तरतम स्थल लगते थे मुझे भी। लेकिन अब डरावने लगने लगे है। दैनिक भास्कर के राजस्थान स्टेट हेड (संपादक) श्री लक्ष्मीप्रसाद पंत जी ने एक पुस्तक लिखी है, नाम है ‘‘हिमालय का कब्रिस्तान’’।

इसी किताब ने मुझे केदारनाथ त्रासदी के भयावह दृश्य दिखा दिए, तेज बारिस और बाढ़ के कारण झेलम नदी के कश्मीर में बरपाए गए कहर के पिक्चर दिखाती हुई यही पुस्तक मुझे काठमाण्डू ले गई। मैं केदारनाथ से लेकर काठमाण्डू तक हर पल पंतजी के साथ रहा और उनसे बहुत कुछ सीख गया। (पुस्तक पढ़ते हुए।)

यह पुस्तक डराती है (त्रासदियों से), निराश करती है (सरकार के रवैये से), हौसलां बढ़ाती है (सेना के रेस्क्यू ऑपरेशन व जाबांजों की कहानियों से), चिंतित करती है (पर्यावरण के प्रति) और आगाह भी करती है (त्रासदियों की आहटों से)। तीनों त्रासदियों में रही सरकार की नाकामियों को गिनाती है, सरकार की संवेदनहीनता को दर्शाती है, सरकार की लापरवाहियों से अवगत कराती है, इंसान की महत्वकांक्षाओं के आगे प्रकृति के अतिदोहन के प्रति सचेत भी करती है। एक पत्रकार के काम और काम में आने वाली चुनौतियों को दिखाती है, उसकी संवेदनाओं और बाध्यताओं से रूबरू कराती है।

कल 15 दिसम्बर 2018 को यह पुस्तक पढ़ी। इस पुस्तक में श्री पंत जी ने केदारनाथ त्रासदी (2013), कश्मीर में कश्मीर भूकम्प (2005) और काठमाण्डू भूकम्प (2015) के बाद के आंखों देखे हाल का बखूबी से वर्णन किया है। पुस्तक में पहाड़ी पुरूष पंतजी ने कुदरत के कहर का सच बयां करते हुए इन त्रासदियों के कारणों को भी उजागर किया है। सरकार की एंजेसियां, सरकार की लापरवाही, सरकार की गलत नीतियां, प्राकृतिक स्थलों पर अतिक्रमण, अवैध खनन जैसे कई कारण है जो आपदाओं को आमंत्रित करते है। पंतजी ने त्रासदियां नहीं हो इसके लिए भी सचेत किया है। उन्होंने सर्वाधिक केदारनाथ त्रासदी पर लिखा, जिसमें त्रासदी से हुई जनहानि, त्रासदी के बाद हालात सामान्य करने के लिए सरकार की लचर व्यवस्था व सेना के रेस्क्यू ऑपरेशन की सच्चाई तो लिखी है, साथ ही तबाही की तारीख़ों से गुजरते हुए उन सन्नाटों को महसूस करने की गुजारिश करते हुए तबाही की नई तारीख़ों के प्रति सजग करने का प्रयास भी उन्होंने किया है।

इस पुस्तक से ही मुझे ज्ञात हुआ कि केदारनाथ त्रासदी क्यों हुई। यह भी पता चला कि केदारनाथ त्रासदी होगी, इसे लेकर पंतजी ने 2 अगस्त 2004 को ही आगाह कर दिया था। जी, हां . . . दैनिक जागरण के 2 अगस्त 2004 के प्रथम पेज पर उनकी बाइलाइन लीड न्यूज थी, जिसका टाइटल था –
‘‘अब केदारनाथ खतरे में, बम की तरह फटेगा चौराबाड़ी ग्लेशियर’’

2004 में पंतजी का लिखा यह टाइटल 16 जून 2013 को सही साबित हो गया। चौराबाड़ी का ग्लेशियर फट गया और केदारनाथ में तबाही हो गई। पंतजी की खबर को सरकार सिरियस लेती तो शायद ग्लेशियर को फटने से बचाया जा सकता था, शायद आपदा नियंत्रण के प्रबंध किए जा सकते थे लेकिन न सरकार और न ही हम सब चेतावनियों को सिरियसली लेते है। ग्लेशियर फटने की चेतावनी पंतजी ने केदारनाथ त्रासदी के दिन से 9 साल पहले कैसे दे दी। यह जानने के लिए आपको ‘‘हिमालय का कब्रिस्तान’’ पुस्तक पढ़नी चाहिए।

प्रकृति प्रेमी पहाड़ी पुरूष पंतजी ने अपनी पुस्तक में कवियों, गजलकारों, साहित्यकारों, उपन्यासकारों, पत्रकारों, लेखकों, राजनीतिकों आदि के कोटेशन भी छापे है। जैसे पुस्तक के सार को दर्शाता एक कोटेशन है –
‘‘कई बार एक सामाजिक आपदा (अतिक्रमण, बुरी टाउन प्लानिंग) का पर्दाफाश करने के लिए प्राकृतिक आपदा को आना पड़ता है।’’ – जिम वैलिस, लेखक और राजनीतिज्ञ

वे आगाह भी कर रहे है –
“कश्मीर को लेकर उन्होंने एक जगह लिखा है – बेशक, कश्मीर में अब पानी उतर गया है। लेकिन मानसून हर साल आयेगा।”

अमेरिकी लोग गायक और कवि उताह फिलिप्स की लाइनों के माध्यम से – ‘‘धरती मर नहीं रही, बल्कि उसे कत्ल किया जा रहा है और उन कातिलों के नाम-पते भी है।’’

केदारनाथ त्रासदी को लेकर कथित पर्यावरणविद्दों व एनजीओ के लोगों पर भी पंतजी ने तंज कसा है – कई लोग तो हिमालय की बर्फ बेचकर पर्यावरणविद् बने हुए हैं। मीडिया को भी उन्होंने साधा हुआ है। बड़ी दाढ़ी, माथे पर लाल-सफेद साफा और गंभीर दिखते उनके पर्यावरण प्रबंधन में बहुत-सी नकली चिंताएं हैं। हिमालय इनके लिए दुनिया घूमने का माध्यम है। हिमालय को हमें इनसे भी बचाना है।

पंतजी लिखते है – आप कह सकते है कि यह कहानी तो पुरानी है। जवाब है – कितनी ? बस अगली तबाही जितनी ही न ? इस बार भी जगह, तारीख, लोग अलग होंगे। बाकी सब वही। इसलिए याद कराना जरूरी है। क्योंकि गलतियां याद दिलाना भी सीखाने का ही एक तरीका है। और हम सब तबाही की एक और नयी तारीख का इंतजार कर रहे हैं।

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