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बरसों से होली जला रहे है, क्या देखा ऐसा होलिका दहन . . .

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बारां – आज होली का त्यौहार है, इसे भी दशहरे की तरह ही मनाया जाता है। भक्त प्रहलाद अग्नि में जलाकर मार देने के लिए उसकी बुआ होलिका उसे अपनी गोद में लेकर अग्निकुण्ड पर बैठ गई। फिर आग लगाई गई, तय माना जा रहा था कि अग्निकुण्ड ने निकली लपटे वरदान प्राप्त होलिका का कुछ नहीं बिगाड़ सकेगी और उसकी गोद में बैठा भक्त प्रहलाद जलकर राख हो जाएगा। मगर हुआ उल्टा वरदान प्राप्त होलिका का दहन हो गया और भक्त प्रहलाद को कोई आंच नहीं आई। तब से ही आज के दिन होलिका का दहन किया जाता है।

देश भर में अलग-अलग जगह अलग-अलग तरीकों से होलिका का दहन किया जाता है। कहीं उपले जमाकर उनमें आगे लगाई जाती है तो कहीं चारे व लकड़ियों का ढे़र जमा कर उनमें आग लगा दी जाती है। गुजरात में कई जगह नारियलों का ढ़ेर लगाकर उसमें आग लगाई जाती है। राजस्थान में भी होलिका दहन के अलग-अलग तरीके है। गांवों में लोग होली से एक माह पूर्व जंगल में जाकर कांटेदार पेड़ को काट लाते है और मोहल्ले या चौराहे पर गड्ड़ा खोदकर उसे रोप देते है, उसके चारों ओर छोटी-छोटी लकड़ियों का ढ़ेर लगा दिया जाता है। छोटे बच्चे व महिलाएं अपने घरों से भड़बूलिए लेकर आती है, जो एक छोटे के कण्ड़े के रूप में होते है और हरेक के बीच में छेद होता है। वे उन्हें होलिका पर फैंकते है और बाद में उसका दहन कर दिया जाता है।

बारां जिले के मांगरोल में होलिका की प्रतीकात्मक पुतला बनाया जाता है। जिसे कण्डों और लकडियों के ढे़र पर रख जाता है। पुतले में आतिशबाजी की सामग्री भी लगाई जाती है। फिर मुहुर्त के समय पर आतिशबाजी के साथ होलिका का दहन किया कर दिया जाता है। आग में होलिका का पुतला जलकर खाक हो जाता है। इसे देखने के लिए दूर दराज के लोग मांगरोल पहुंचते है।

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