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धर्म और पर्यटन का स्थल है रामकुण्ड बालाजी, देखकर कर्नल टॉड भी हो गए मंत्रमुग्ध

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सौरभ जैन/सुनेल/झालावाड़ – मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम के परमभक्त हनुमान के प्रति सच्ची श्रद्वा भक्ति का जाग्रत केन्द्र है – रामकुण्ड बालाजी का मंदिर। मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम की भक्ति साधना में लीन हनुमान यहां लोकभाषा में बालाजी के नाम से प्रख्यात है। श्रीराम की स्मृति और यहां प्रतिष्ठित स्वयं-भू हनुमान (बालाजी) के कारण इस पवित्र स्थान का नाम रामकुण्ड बालाजी हुआ। क्षेत्रीय जनकण्ठों में रची-पची लोकानुश्रुति के अनुसार श्रीराम ने लंका से अयोध्या की ओर जाते समय इसी स्थल पर एक रात्रि अपने भ्राता लक्ष्मण व भार्या सीता के साथ व्यतीत की थी। उस समय यह स्थल सघन वन था। यहॉं एक सुन्दर झरना कुण्डरूप में था, जो काफी ऊॅचाई से गिरता था। बाद में इसी कारण इसका नाम रामकुण्ड बालाजी हुआ। श्रद्वा और भक्ति का यह स्थल पर्यटकों के लिए बड़ा मनोहारी है।

यह स्थल झालावाड़ जिले के सुनेल से करीब 17 किलोमीटर दूर कनवाड़ा-कनवाडी में स्थित है। श्री रामकुण्ड बालाजी मंदिर भवानीमंडी मार्ग पर स्थित भीलवाड़ा ग्राम से दक्षिण में 9 किलोमीटर दूर पवित्र जयंती नदी के तट पर स्थित है। इतिहासकर कर्नल जेम्स टाड भी 11 दिसम्बर 1821 ई. को अपनी यात्रा के दौरान इस गांव की सुन्दर और सुव्यवस्थित दशा देख मुग्ध हो उठे थे। उसने अपनी डायरी में कनवाड़ा-कनवाड़ी की बड़ी प्रशंसा करते हुए स्पष्ट लिखा कि यहाँ गेहूॅं और ज्वार बहुत होते है पर गेहूॅ की खेती अधिक विशेष होने से कनवाड़ा-कनवाड़ी यथा नाम तथा गुण हो गया। जेम्स टॉड द्वारा उल्लेखित यह बात जिसका यह चक्षु साक्षी रहा, वाकई इस क्षेत्र की कृषि व्यवस्था की उन्नति का अद्भूत प्रमाण है, प्रतीत होता है। उस समय कनवाड़ा-कनवाड़ी प्रसिद्व कृषि केन्द्र थे।

मंदिर समिति के अध्यक्ष हरि सिंह गुर्जर, मुख्य संरक्षक जानकी लाल रावल, कोषाध्यक्ष रामदयाल गुप्ता व उपाध्यक्ष लक्ष्मीनारायण नागर ने बताया कि उन्मुक्त नील गगन और प्रकृति की हरीभरी गोद में बना बालाजी का यह सुन्दर श्रद्धा मंदिर भक्तों और पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है, अतः यहॉं रोजाना कई परिवार आते है। वे यहॉं गोठ की ठाम का पार्यटनिक आनन्द उठाते है। चारों और फैली हरी धानी चूनर इस क्षेत्र को ओर भी मनोहारी बना देती है। हनुमान की भक्ति के मधुर गीतों, भजनों तथा पक्षियों के कर्ण प्रिय स्वर कानों में अमृत घोल देते है।

समिति के सदस्य रामगोपाल गुप्ता व प्रवक्ता अशोक कुमार दुबे ने बताया कि आज के दौर में मानव मन को जिस सच्ची भक्ति श्रद्धा व शान्त रमणीक स्थल की नितान्त आवश्यकता है। सचमुच इसी का निदान स्थल है रामकुण्ड बालाजी। शीतल सरिता का जल, शुद्व, पर्यावरण, भक्ति और पार्यटनिक समन्वय का ऐसा सुन्दर धाम आस-पास कहीं देखने में नहीं आता।

कोषाध्यक्ष चेन सिंह नागर, रामभरोस गुप्ता व हनुमानप्रसाद नागर ने बताया कि 1967-68 ई. में रामकुण्ड के स्थल पर एक चबूतरा मात्र था, जिस पर स्वयं-भू बालाजी की प्रतिमा मात्र थी। तब कनवाड़ा के भक्त रामबक्क्ष मंगलवार को बालाजी का ध्वज लेकर कनवाड़ा-कनवाड़ी में घूम-घूमकर कर भक्ति की गंगा प्रवाहित करते थे। उनके ऐसे धर्म कार्य से प्रभावित होकर कालान्तर में उनके सहयोग के लिए गांव के हजारों हाथ बढ़े। यहॉं भक्ति पारायण का भव्य आयोजन हुआ तभी से इस स्थल की चौमुखी उन्नति हुई। भक्ति की ऐसी भावना से बालाजी ने अपनी कृपा बरसाई और 1983 ई. में उनके भक्त सेठ रामकुमार जुलानियॉं (भिलवाड़ी वाले) ने अपनी भार्या सहित यहॉं एक छतरी का निर्माण करवाया। बाद में यहॉं के धार्मिक लोगों ने समन्वयी आधार पर मंदिर विकासार्थ श्रीरामकुण्ड बालाजी सेवा समिति का गठन किया। समिति के स्वंयस्फूर्त और निष्ठावान लोगों ने बालाजी की छतरी को भव्य रूप देकर दर्शनीय देवालय बनाया। सरकारी अमलों ने आशीर्वाद पाने की भावना से ग्राम सडक़, एनीकट आदि को इस मंदिर से जोडक़र सुन्दरता, सहजता प्रदान की शीघ्र क्रियान्विति से इस मंदिर की आश्चर्यजनक प्रसिद्वि हुई और हाड़ौती-मालवा का स्तर लांघ यह मंदिर राजस्थान, मध्यप्रदेश राज्यों के लोक मंदिरों में प्रसिद्ध हुआ। 1953 ई. से यहॉं हनुमान जंयती (चैत्रमाह) में सप्ताह भर रामकुण्ड बालाजी मेला आयोजित होना आरम्भ हुआ।

मेला संचालन और भक्तों, पर्यटकों, सन्तों की सुव्यवस्था हेतु एक मेला समिति का गठन किया निष्ठा, ईमानदारी की कार्यपद्वति से शीघ्र ही यह मेला बड़े स्वरूप में उभरा और क्षेत्र के बड़े मेलों में अपना स्थान बनाने में सफल हुआ प्रतिवर्ष आयोजित होते इस मेले का स्वरूप अब इतना आकर्षक हो गया कि इसमें शहरी और ग्रामीण संस्कृति के साथ-साथ पर्यटकों का भी संगम देखने में आया। मेले में सांस्कृतिक संध्या, भक्ति भावांजलि भजन, लोक संस्कृति व मनोरंजन के साधन सभी कुछ कैमरे में कैद करने लायक होते है। मेला समिति और ग्राम पंचायत का समन्वयी संचालन, मेले की भव्यता में चार चांद लगाते है। पूरे सप्ताह इस मेले में भारत की लोक संस्कृति के सुन्दर एवं समन्वयी दर्शन होते है।

रामकुण्ड बालाजी मंदिर का प्रवेशद्वार सुन्दर औैर भव्यता लिये है। इसमें प्रवेश करने पर हरे भरे बाग बगीचों व पुष्पवीथिका पथ को पार कर जयन्ती नदी के किनारे श्रीरामकुण्ड बालाजी का लघु किन्तु सुन्दर मंदिर है इसमें भगवान हनुमान लोक प्रसिद्व बालाजी नाम से स्वयं-भू स्वरूप में अपने जाग्रत, चमत्कारी मुख मंडल रूप से प्रतिष्ठित है। बालाजी की यह मूर्ति प्राचीन और जन-जन की आराध्य है। इनके दर्शन कर मन में भक्ति और आत्मबल का अद्भूत संचार होता है। मंदिर में बजती राम नाम की भक्ति-ध्वनि भक्तों, पर्यटकों को आल्हादित कर देती है। मूर्ति सदैव लालकामी, चमक, सुगन्ध तथा पुष्पहार से श्रृंगारित सेवित रहती है। दक्षिणामुखी होने से इसे अत्यन्त चमत्कारी माना जाता है मान्यता है कि अटूट आस्था से जो भी जीव जगत बालाजी के समक्ष कामना लेकर आता है तथा विश्वास रखता है बालाजी की कृपा से उसे सदैव विजयश्री प्राप्त होती है। माना जाता है कि बालाजी की भक्ति से निपूती को पूत की प्राप्ति होती है तथा प्रेतग्रस्त व्यक्ति की प्रेत से मुक्ति होती है ऐसी समस्या और ऊपरी व्याधियों के यहां निवारण भी होते है। अतः बारहोमास यहॉं मनौती मांगने वालों का तांता लगा रहता है। मनौती के लिए निपूति महिलाएं यहां सन्तान कामना हेतु पालना भी बांधती है। मनौती की यह भावना हमारे देश के लोक देवताओं से प्राचीन काल से जुड़ी रही है।

रामकुण्ड बालाजी मंदिर के आस-पास लगभग चार दर्जन से अधिक कस्बे औैर ग्राम है। इस क्षेत्र में जिस घर में नया वाहन या नयी दुल्हन आती है उन्हें प्रथमतया शीश नवाने, पूजन करवाने यहॉं आना होता है। यहां प्रति मंगलवार, नवरात्रि, हनुमान जयंती व अन्य वैष्णव त्यौहारों पर काफी भक्त आते है अन्य दिवसों पर दर्शनार्थ यहॉं सैकड़ों आला अफसर, शहरी परिवार आते है तथा गोठ की ठाम का प्राकृतिक आनन्द उठाते है। बालाजी मंदिर के ठीक सामने उनके परम आराध्य भगवान राम, सीता तथा लक्ष्मण का सुन्दर मंदिर दर्शनीय है। इसका निर्माण 1998 ई. में इनामी ड्रॉ की बचत राशि से करवाया गया था। 1999 ई. में यहॉं उक्त मूर्तियां प्रतिष्ठित की गई।

मंदिर की कला तथा चित्रकारी चित्ताकर्षक है। मंदिर में स्थापित प्रतिमाएं भक्ति भाव से श्रृंगारित व पूजित है। दोनों मंदिरों के शिखर पर लगा धर्म ध्वज नील गगन से झॉकते देवी-देवताओं को सहज ही आमंत्रित करना जान पड़ता है। दोनों मंदिर जयन्ती नदी के तीर पर बने है। नदी का दृश्य तथा चारों और फैली प्राकृतिक खुबसूरती भक्ति पर्यटकों को अपनी ओर स्वतः ही आकर्षित करने की क्षमता रखती है। मंदिर का सारा प्रबन्ध संचालन श्रीरामकुण्ड बालाजी सेवा समिति द्वारा किया जाता है। मंदिर परिसर में आवास तथा रात्रि विश्राम हेतु सर्व सुविधायुक्त विशाल तथा हवादार कक्षों वाली धर्मशाला है। यहां बड़ी भोजनशाला, जलव्यवस्था उत्तम स्तर की है। राज्य सरकार की ओर से निकट में दो सामुदायिक भवन, विधायक कोष से भवन, कुऑ, घाट निर्मित है। मंदिर परिसर में 160 विविध प्रजाति के मनोहारी पौधों की बगीची है। प्रतिवर्ष चैत्र मेले के अवसर पर यहॉं राष्ट्रीय स्तरीय भागवत कथा, कवि सम्मेलन, कलश यात्रा तथा विशाल भंडारा आयोजित होता है।

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