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सूफीवाद की आज के भारत में प्रासंगिकता

ईश्वर की उपासना का उच्चतम स्वरूप है, ‘‘नदी जैसी उदारता, सूर्य जैसी दानशीलता और धरती जैसी मेहमाननवाजी‘‘

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नेहा दाभाड़े

जानेमाने अध्येता कार्ल अर्नेस्ट का कहना है कि सूफीवाद, किसी सामाजिक लक्ष्य को हासिल करने या सामाजिक समस्या को सुलझाने का उपकरण नहीं हो सकता। अर्नेस्ट से पूछा गया था कि क्या सूफी परंपरा, वैश्विक आतंकवाद से उपजे इस्लाम के प्रति नफरत के भाव का मुकाबला कर सकती है और इस्लाम का नर्म चेहरा बन सकती है।

अर्नेस्ट, मुंबई में सूफीवाद पर एक दो-दिवसीय संगोष्ठी में भाग ले रहे थे। संगोष्ठी का आयोजन 22-23 फरवरी, 2018 को सेंटर फार स्टडी ऑफ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म ने किया था। यह आयोजन सूफीवाद को उसकी समस्त जटिलताओं के साथ समझने का प्रयास था। आयोजन में सूफी संतों की जीवनयात्रा और उनके जीवन की शिक्षाप्रद घटनाओं के जरिए सूफीवाद के सिद्धांतों को समझने की कोशिश की गई। संगोष्ठी का मुख्य लक्ष्य था भारत की अन्य रहस्यवादी परंपराओं व सूफी विचारों की परस्पर अंतःक्रिया और उसके भारत की संस्कृति और सामाजिक सौहार्द पर प्रभाव को समझना। संगोष्ठी में इस सवाल पर भी विचार किया गया कि आज हमारे समाज के समक्ष जो चुनौतियां प्रस्तुत हैं, सूफीवाद क्या उनसे मुकाबला करने में हमारी मदद कर सकता है, और यदि हां, तो कैसे ?

डॉ सैयय्दा हमीद ने अपने मुख्य वक्तव्य में मौलाना आजाद और सरमद शहीद के उदाहरण देते हुए, भारत में सूफीवाद की समृद्ध परंपरा पर प्रकाश डाला। मौलाना आजाद, जो सांझा राष्ट्रवाद और बहुवाद के हामी थे, सरमद से गहरे तक प्रभावित थे। सरमद एक आर्मीनियाई यहूदी थे, जो औरंगजेब के भाई और मुगल बादशह शहजहां के पुत्र, शहजादा दारासशिकोह के शिक्षक बने। अपनी उदार सोच के कारण वे व्यवस्था के लिए खतरा बन गए थे। उनकी आलोचनात्मक दृष्टि और सादगी (वे सड़कों पर नंगे घूमा करते थे) अतिधर्मनिष्ठ और कट्टर इस्लाम के लिए चुनौती बन गई थी।

डॉ. हमीद ने वहदतुल वजूद (ईश्वर की एकता) के सिद्धांत पर प्रकाश डालते हुए बताया कि किस तरह भारतीय सूफियों ने रहस्यवाद और उपासना के जरिए, ईश्वर से सीधा रिश्ता बनाने का प्रयास किया। सूफी, ईश्वर के साथ एक हो जाना चाहते थे और इसके लिए वे अपना संपूर्ण प्रेम अर्पित कर देते थे। उन्होंने राबिया बसरी को उद्धत करते हुए कहा :

‘‘अगर मैं दोजख के डर से तुमसे प्रेम करता हूं, तो मुझे दोजख की आग में जलाओ,
अगर मैं जन्नत की तमन्ना में तुम से प्रेम करता हूं, तो मुझे जन्नत से बेदखल कर दो,
परंतु यदि मैं केवल तुम्हारे लिए तुम से प्रेम करता हूं,
तो मुझे अपने शाश्वत सौंदर्य से जुदा न करो‘‘

अर्थात हमें ईश्वर की आराधना किसी भय के कारण या कोई लाभ पाने की इच्छा से नहीं करनी चाहिए, बल्कि केवल और केवल ईश्वर के प्रति प्रेम के कारण हमें उससे जुड़ने का प्रयास करना चाहिए।

डॉ. हमीद ने भारत के सबसे प्रसिद्ध सूफी संत मोईनुद्दीन चिश्ती को उद्धत करते हुए कहा कि चिश्ती के अनुसार, ईश्वर की उपासना का उच्चतम स्वरूप है, ‘‘नदी जैसी उदारता, सूर्य जैसी दानशीलता और धरती जैसी मेहमाननवाजी‘‘। सूफीवाद, भौतिक दुनिया के प्रति अनासक्ति और जरूरतमंदों की सेवा करने का संदेश देता है। इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए प्रोफेसर इलीना सेन ने बंगाल की बाउल-फकीर परंपरा के बारे में बताया। बाउल एक मुस्लिम सूफी संत लल्लन फकीर के अनुयायी हैं। वे अखाड़ों में निवास करते हैं और परिवार या निजी संपत्ति में विश्वास नहीं रखते। बाउल समानता के पैरोकार हैं और जाति, धर्म या लिंग की दीवारें उनके लिए मानो अस्तित्वहीन हैं। इस परंपरा के अनुयायियों में हिन्दू और मुसलमान दोनों शामिल हैं, और यह बंगाल की सांझा संस्कृति का प्रतीक है। विडंबना यह है कि हिन्दू धर्म और इस्लाम, दोनों का कटट्रपंथी तबका, बाउल परंपरा को खारिज करता है और इसे धर्मविरूद्ध बताता है। बंगाल के सूफी संतों ने अविभाजित बंगाल में समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों जैसे किसानों के साथ निकट संबंध स्थापित किए और यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में उनके अनुयायी भारी संख्या में हैं।

बंगाल की बाउल परंपरा की तरह, सांझा संस्कृति की प्रतीक कई अन्य परंपराएं भारत के अन्य राज्यों में देखी जा सकतीं हैं। अपने एक अत्यंत दिलचस्प शोध, जिसका शीर्षक था ‘सूईयां, जो रफू करती हैं, न कि कैंचियां, जो काटती हैं : दिल्ली के दो सूफी उत्सव‘ में राना सफी ने कहा कि सूफीवाद वह सूई है, जिसने भारत के सामाजिक तानेबाने में बहुवाद को बुना है और इस तरह, सामाजिक सौहार्द की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने जिन दो सूफी उत्सवों की चर्चा की, वे हैं हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर आयोजित होने वाला वसंत उत्सव और कुतुबउद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह पर हर साल होने वाली फूलवालों की सैर।

औलिया की दरगाह पर आयोजित होने वाले वसंत उत्सव से एक दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि निजामुद्दीन औलिया, अपने भतीजे की एक बीमारी से मृत्यु के बाद उदास रहने लगे थे। उनके होंठों पर मुस्कान वापिस लाने के लिए उनके शिष्य अमीर खुसरो ने पीली साड़ी पहनकर उनके समक्ष वह गाना गाया, जिसे उन्होंने कुछ महिलाओं को गाते सुना था। ये महिलाएं सरसों के फूल हाथों में लेकर ख्वाजा की खानकाह के नजदीक एक सड़क पर गाना गा रहीं थीं। उन महिलाओं ने खुसरो को बताया कि वे इन फूलों को भगवान को चढ़ाने मंदिर जा रही हैं क्योंकि उनका मानना था कि इससे भगवान प्रसन्न होंगे। अपने गुरू को गहरे विषाद से बाहर निकालने के लिए, खुसरो ने उसी तरह के कपड़े पहने और वही गाना गाया। औलिया ने जब अपने अपने सबसे पसंदीदा शिष्य को पहचाना तो वे मुस्करा दिए। इसके बाद से ही दरगाह पर हर वर्ष वसंत मनाया जाता है जिसमें बड़ी संख्या में गैर-मुसलमान हिस्सा लेते हैं।

इसी तरह, फूलवालों की सैर भी भारत की सांझा संस्कृति का उदाहरण है। अपने प्रिय पुत्र को अंग्रेजों द्वारा जेल से रिहा कर दिए जाने के बाद, मुगल बादशाह अकबर द्वितीय और उनकी बेगम मुमताज महल ने ख्वाजा कुतुबउद्दीन बख्तियार काकी की महरौली स्थित दरगाह पर फूलों की चादर चढ़ाई थी। बादशाह, जिनके लिए उनकी पूरी प्रजा एक समान थी, ने भगवान कृष्ण की बहन योगमाया देवी के प्राचीन मंदिर, जो दरगाह के नजदीक है, में भी फूल चढ़ाए। प्रत्येक वर्ष बादशाह और उनके दरबारी, दरगाह और मंदिर दोनों जाया करते थे। अगर किसी कारणवश वे मंदिर नहीं जा पाते थे तो वे दरगाह भी नहीं जाते थे।

प्रोफेसर जाफरी ने बताया कि किस प्रकार चिश्ती सूफियों और भारत के अन्य समुदायों ने एक-दूसरे के रस्मों-रिवाजों और परंपराओं को अपनाया। उन्होंने कहा कि सूफियों के कारण कुछ बोलियां भाषा के रूप में विकसित हो सकीं क्योंकि सूफियों ने इन बोलियों को अपने विचारों को फैलाने का माध्यम बनाया।

साहित्य, सूफीवाद का एक महत्वपूर्ण घटक है। मुगल राजाओं ने कई हिंदू संस्कृत ग्रंथों का फारसी में अनुवाद करवाया। प्रोफेसर शंकर नायर ने निजाम अल-दीन पानीपती द्वारा ‘लघुयोगवषिष्ठ‘ के संस्कृत से फारसी में अनुवाद की चर्चा की। प्रोफेसर नायर का कहना था कि मुगल बादशाह, संस्कृत ग्रंथों में इसलिए रूचि लेते थे ताकि वे भारतीय के रूप में अपनी स्वीकार्यता बढ़ा सकें। सूफी दर्शन ने उन्हें वह वैचारिक ढांचा उपलब्ध करवाया, जिसकी मदद से वे इन अनुवादों और उनमें निहित विचारों को समझ सकें।

कोई ताज्जुब नहीं कि सूफी परम्पराओं की समृद्धता और संस्कृति पर उनके गहरे प्रभाव के कारण, पूरे विश्व में सूफी संगीत और उत्सव लोकप्रिय हो रहे हैं। कार्ल अर्नेस्ट के अनुसार वैश्वीकरण और उपभोक्तावाद के बढ़ने के कारण संगीत और उत्सवों के माध्यम से सूफी विचार पूरी दुनिया में फैल रहा है।

सूफी सिध्ताओं और सांझा संस्कृति के विकास में उनके योगदान की चर्चा के दौरान जो एक महत्वपूर्ण सवाल उभरा वह यह था कि क्या सूफीवाद, इस्लाम ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों में भी बढ़ती कट्टरता का मुकाबला कर सकता है। सुल्तान शाहीन ने अपने शोधपत्र में इस्लाम के वहाबीकरण और मुस्लिम युवकों में बढ़ती कट्टरता पर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि क्या सूफीवाद दुनिया के समक्ष इस्लाम का एक नर्म चेहरा प्रस्तुत करने में सक्षम हो सकता है।

प्रोफेसर साना अजीज का कहना था कि सूफीवाद ने इस्लाम में सुधारों पर भी अपना प्रभाव डाला। मेहरू जफर ने कहा कि इस्लामिक इतिहास, पूर्व-इस्लामिक इतिहास का संज्ञान नहीं लेता और उसकी परंपरा को नकारता है। उनके इस कथन को चुनौती देते हुए कई अन्य अध्येताओं ने जोर देकर कहा कि इस्लाम ने कई पूर्व-इस्लामिक परंपराओं को अपनाया है और अन्य पैगंबरों को भी स्वीकार किया है।

सूफीवाद की ऐतिहासिक यात्रा, जटिलताओं और उतार-चढ़ावों से भरी रही है। परंतु आज, सूफीवाद पर प्रमुख विमर्श क्या है? इरफान इंजीनियर ने इस सिलसिले मे दो उल्लेख किए, जो शिक्षाप्रद हो सकते हैं। पहला था पश्चिम बंगाल के बशीरहाट में ‘पीर‘ की संस्था का दुरूपयोग और दूसरा, मुंबई की हाजी अली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी। दूसरे मामले में अदालत ने महिलाओं को दरगाह में जाने की अनुमति दे दी। इरफान इंजीनियर का कहना था कि सूफी दरगाहें अपना समावेश चरित्र खो रही हैं और रूढ़िवाद, पदक्रम और स्त्रियों के साथ भेदभाव के दुष्चक्र में फंस रही हैं।

पश्चिम बंगाल के बशीरहाट, जो सन् 2017 में हिन्दू-मुस्लिम दंगों का एक मुख्य केन्द्र था, की अपनी यात्रा के दौरान इरफान इंजीनियर ने पाया कि पीर की संस्था, वंशवादी बनती जा रही है। वहां के पीर का एक लड़का था जो पीर के प्रभाव का उपयोग अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए कर रहा था। विवाद और संघर्ष की स्थितियों में शांति स्थापना के लिए काम करने की बजाए, पीर की संस्था का इस्तेमाल राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए किया जा रहा था। स्पष्टतः यह भारत के निजामुद्दीन औलिया जैसे सूफियों द्वारा स्थापित परंपराओं को कमजोर करने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि निहित स्वार्थों के चलते, सूफी परंपरा भी दूषित होती जा रही है। यह परंपरा इतनी महत्वपूर्ण है कि इसे सुरक्षित बनाए रखने की जिम्मेदारी केवल सूफियों को नहीं सौंपी जा सकती। सभी उदार और प्रगतिशील लोगों को आगे आकर इस परंपरा की रक्षा के लिए कदम उठाने चाहिए और सामाजिक सौहार्द की स्थापना के लिए सूफीवाद के साथ-साथ, अन्य धर्मों की उदारवादी परंपराओं और गैर-धार्मिक उदारवादी सोच का इस्तेमाल करना चाहिए।

दरगाहों और सूफीवाद से जुड़ी अन्य संस्थाओं का राजनीतिकरण, एक तरह से निजामुद्दीन औलिया जैसे संतों की परंपरा के ठीक उलट है। निजामुद्दीन औलिया, राज्य और सत्ता से दूरी बनाए रखते थे, यद्यपि सूफीवाद के कुछ अन्य धड़े जैसे नक्षबंदी, राज्य के नजदीक थे और उन्हें सत्ता का संरक्षण प्राप्त था। निजामुद्दीन औलिया का मानना था कि कोई व्यक्ति या तो राज्य की सेवा कर सकता है या ईश्वर की। उनके लिए किसी व्यक्ति की प्रसन्नता सबसे महत्वपूर्ण थी। परंतु आज, औलिया की शिक्षाओं के विपरीत, सूफी विचारों का इस्तेमाल समाज और राजनीति के क्षेत्र में सत्ता हासिल करने के लिए किया जा रहा है।

इस सबके बावजूद, सूफी विचारों की भारत की सांझा संस्कृति के निर्माण और यहां सामाजिक सौहार्द की स्थापना में भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता। सूफीवाद ने हमारी संस्कृति और समाज के अनेक पक्षों को प्रभावित किया है। सूफीवाद, राहत पहुंचाने वाले एक मरहम का काम कर सकता है। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक समाज, जहां दुर्भाग्यवश धार्मिक पहचानों का इस्तेमाल समाज को धु्रवीकृत करने के लिए किया जा रहा है, में सूफीवाद हमें एक बेशकीमती उपहार दे सकता है और वह है प्रेम। जैसा कि रूमी ने कहा था, प्रेम सभी को गले लगाता है और सभी पहचानें उसमें समाहित हो जाती हैं। संघर्षों और विवादों से भरे हमारे समाज के लिए यह एक अमूल्य शिक्षा है। (अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

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