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खतरे में है कई पक्षी प्रजातियां, ऐसा करके बचा सकते है हम

संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियों को बचा रहे सुखाडिया विश्वविद्यालय के शोधार्थी

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उदयपुर – सुखाडिया विश्वविद्यालय के प्राणीशास्त्र विभाग के शोधार्थी सुनील चौधरी लोगों को संकट ग्रस्त पक्षी प्रजातियों को बचाने का सन्देश दे रहे है। वे दक्षिणी राजस्थान के गाँवों में जब भी सर्वे पर जाते है तो लोगों को पक्षियों के महत्व के बारे में बताते है। लोगों को बताते है कि पर्यावरण में सभी जीवों का अपना महत्व होता है। सुनील बताते है कि इस श्रंखला में एक भी कड़ी विलुप्त हुई तो इसके नकरात्मक परीणाम प्राप्त होंगे। भारत में अभी तक लगबग 1230 पक्षी प्रजातियाँ पहचानी गई है जिन में से 80 से 90 के आस-पास पक्षी प्रजातियाँ हम खो चुके है। बहुत-सी पक्षी प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर है तो कुछ प्रजातियाँ संघर्ष कर रही है।

सुनील चौधरी मूलतः जयपुर के रहने वाले है जो डॉ. विजय कुमार कोली के निर्देशन में संकटग्रस्त पक्षी प्रजाति सफेद बुज्जा (ब्लैक हेडेड इबिस ) पर शोध कार्य कर रहे है।

 

यह सफेद बुज्जा भारत के कुछ हिस्सों, पाकिस्तान और नेपाल में पाया जाता है। दक्षिणि राजस्थान में छिछले जलाशयों के आस-पास पाई जाने वाली प्रमुख पक्षी प्रजाति है। जो झीलों, नदियों तालाबों तथा नालों के किनारों मिलती है। यह पानी भरे खेतों तथा छोटे-छोटे गड्डों के आस-पास भी मिल जाते है। सफेद बुज्जा ७५ सेमी. लम्बा पक्षी है जिसकी गर्दन काली तथा चोंच मूडी हुई होती है। मूलतः यह छोटे-छोटे कीटों, मछिलयों, मेंड़को को खाता है। यह शाम के समय शहर या गाँवों के आस-पास ऊंचें पेड़ों जैसे यूकेलिप्टस (सफेदा), बबूल और पीपल के पेड़ों पर बगुले, कोर्मोरेंट्स, हेरॉन्स आदि के साथ विश्राम करते है। अगस्त-सितम्बर माह इसके प्रजनन काल का समय है। यह अपने घोंसले जलाशयों के बीच में स्थित टापूओं या जलाशयों के आस-पास बनाते है। यह एक बार में २-४ अंडे देता है तथा १५ से २० दिनों में अपने आश्रय स्थल बदलता रहता है। लोग पेड़ों की कटिंग कर इनके आश्रय स्थल नष्ट कर रहे है। शिकार, आवस, और भोजन की कमी के करण इनकी संख्या में निरंतर कमी आ रही है। मानवीय क्रिया कलापों के कारण निरंतर इसके क्षेत्र खत्म हो रहे। यह पूर्णतयाः जलीय पक्षी है लेकिन आजकल यह मरे हुए जानवरों के शवों, ब्रेड और होटल से वेस्टेज से भोजन कर अपने आपको बचाने की कोशिश कर रहा है।

सुनील का मानना है कि वर्तमान समय में तालाबों तथा झीलों के पानी का दोहन कर पेयजल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है अगर तालाबों व झीलों के पानी का दोहन नहीं किया जाए तो इन पक्षी प्रजातियों को आसानी से भोजन मिल सकेगा। साथ ही इस संकट ग्रस्त प्रजाति के आशियाने ना उजाड़ कर इसके संरक्षण में योगदान देने से इन प्रजातियों को बचाया जा सकेगा।

घरेलू चिड़िया (हाउस स्पेरो) संरक्षण में मददगार चप्पल-जूतों के बॉक्स

घरेलु चिड़िया भारत में पाई जाने वाली प्रमुख पक्षी प्रजाति है जो छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़ों, मच्छरों और अनाज के दाने खाती है! यह कच्चे घरों में बने छोटे-छोटे छेदों और छपरों में अपना घौंसला बनाती है। लेकिन आजकल कच्चे घरों के स्थान पर पक्के मकानों हो गए है, इन पक्के मकानों में लोग बिलकुल भी जगह नहीं छोड़ते है, इस कारण घरेलू चिड़िया के घौंसलें बनाने के स्थान खत्म हो गये इस कारण आज यह संकटग्रस्त प्राणी की श्रेणी में आ गई है। प्रजनन के स्थान के लिए यह चिड़िया संघर्ष कर रही है। पक्के मकानों में प्रजनन के स्थान बनाकर इस चिड़िया को बचाया जा सकता है।

ये फरवरी-मार्च के महीने में अपने घौंसले बनाना शुरू करती है उस समय पक्के मकानों के आस-पास बार-बार आती है लेकिन जगह नहीं मिलने के कारण वापस लौट जाती है। पक्के मकानों की खिड़कियों के बाहर या दीवारों में कील लगाकर इसके लिए घौंसले लगाये जा सकते है। घोंसले बनाने के लिए चप्पल-जूतों के बॉक्स तथा कार्टून को काम में ले सकते है। कार्टून को फोल्ड कर के चप्पल-जूतों के डिब्बे के आकार का बना कर उसमें चिड़िया के अंदर घुसने जितना सा छेद कर के घर के बहार लगाया जा सकता है। कुछ समय बाद यह उसमें अपना घौंसला बनाने लगती है। जैसे ही इसके बच्चे बड़़े होकर उड़ जाये तब घौंसले को वापस हटा कर रख सकते है।

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