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जनता परिवर्तन लाएगी

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  • वेदव्यास

ये हमारा सौभाग्य है कि आज हम 21वीं शताब्दी में भारत के प्रभुसत्ता संपन्न गणराज्य के नागरिक हैं तथा अपने विकास और परिवर्तन के लिए संविधानिक व्यवस्था से सुरक्षित हैं। हमें अपने अधिकारों और कर्तव्यों की सनद मिली हुई है।  इसलिए घबराइए मत और इतिहास की विसंगतियों, प्रतिस्पर्धाओं और भूलचूक से लड़ते रहिए और आवश्यक सुधार भी करते रहिए क्योंकि लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष भी अनिवार्य हैं और सच तथा झूठ भी अनिवार्य हैं तो हार और जीत भी धूप-छांव की तरह हैं। ऐसे में लोकतंत्र और संविधान नए भारत की ऐसी विरासत और धरोहर हैं जिसके लिए संस्कृतियों और परपंराओं का तथा नूतन और पुरातन की मुठभेड़ जारी रहनी चाहिए।

भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि ‘हम भारत के लोग’ बार-बार अपनों से धोखा खाते हैं और निराश भी होते हैं लेकिन जीवन में सत्य, अहिंसा और सद्भाव का साथ कभी नहीं छोड़ते। हममें से कुछ लोग भले ही काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह का शिकार हो जाते हैं किंतु देर-सबेर वे भी ये मानकर पछतावा करते हैं कि मनुष्य की आत्मा को अच्छे कार्य करने से ही सद्गति मिलती है सकारात्मक और नकारात्मक समाज की जीवन धारा में इसीलिए अविश्वास और विश्वास का संघर्ष चलता रहता है लेकिन अंततोगत्वा मनुष्य का मन जहाज से उड़े पंछी की तरह फिर जहाज पर ही आता है और अपनी अनंत खुशी को ढूंढ़ता है।

हमारे लोकतंत्र में संविधान ही एक ऐसा आधार ग्रंथ है जिसमें भारत के प्रत्येक नागरिक को न्याय, समानता और संघर्ष के अधिकार मिलते हैं। दुनिया के सभी देशों में आज ये ही खोज चल रही है कि मानव समाज का भविष्य कैसे सुख-शांति और रिद्धि-सिद्धि को प्राप्त करे। लेकिन समय की अंर्तदशा मनुष्य के ज्ञान-विज्ञान को लगातार से चुनौती देती है सत्य, शिव और सुंदर भी कभी पूर्ण नहीं होते। मन और विचारों का ये संकट भी आज का नहीं है अपितु मनुष्य जीवन की उत्पत्ति से जारी है। जब कभी कबीलों का समाज था तब भी निर्बल को सबल की दासता करनी पड़ती थी तो असुरों को सुरों से टकराना पड़ता था तो राजा/राय को भी प्रजा की मर्यादा के लिए रावण से जूझना पड़ा था तो पांडवों को भी कौरवों से महाभारत करनी पड़ी थी और सभ्यता की विकास यात्रा में देशी-विदेशी आंतताईयों से युद्ध लड़ना होता था। ये हमारा सौभाग्य है कि आज हम 21वीं शताब्दी में भारत के प्रभुसत्ता संपन्न गणराज्य के नागरिक हैं तथा अपने विकास और परिवर्तन के लिए संविधानिक व्यवस्था से सुरक्षित हैं। हमें अपने अधिकारों और कर्तव्यों की सनद मिली हुई है।

इसलिए घबराइए मत और इतिहास की विसंगतियों, प्रतिस्पर्धाओं और भूलचूक से लड़ते रहिए और आवश्यक सुधार भी करते रहिए क्योंकि लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष भी अनिवार्य हैं और सच तथा झूठ भी अनिवार्य हैं तो हार और जीत भी धूप-छांव की तरह हैं। ऐसे में लोकतंत्र और संविधान नए भारत की ऐसी विरासत और धरोहर हैं जिसके लिए संस्कृतियों और परपंराओं का तथा नूतन और पुरातन की मुठभेड़ जारी रहनी चाहिए।

महात्मा गांधी ये ही तो कहते थे कि मनुष्य के लिए सत्य, अहिंसा, समानता और सद्भाव का रास्ता ही लोकतंत्र का मूल मंत्र है। आज के भारत में हमारी सबसे बड़ी चिंता और चुनौती ये है कि कुछ लोग धर्म, जाति, संप्रदाय, गैर बराबरी, भाषा और क्षेत्रियता के न्याय पर लोकतंत्र संविधान को एकाधिकारवादी और अधिनायकवादी और बहुसंख्यक (हिंदुत्व) राष्ट्रवादी व्यवस्था में बदलना चाहते हैं। लोकतंत्र और संविधान को नष्ट अथवा बदलने की वर्तमान राजनीति इसीलिए गांधी-अंबडेकर और हमारे स्वतंत्रता संग्राम को भूल रही है क्योंकि लोकतंत्र में सभी विकल्प-भारत के नागरिक के पास है। ये ही कारण है कि मतदाता और चुनाव प्रणाली को साम, दाम, दंड, भेद से नष्ट-भ्रष्ट किया जाता है और धर्म-जाति के हथियार, धनदौलत के गोला बारूद और गरीब- अमीर के भेदभाव काम में लिए जाते हैं। यदि तानाशाह किसी से डरता है तो वह लोकतंत्र ही है और ये लोकतंत्र अनेक महायुद्ध लड़कर हमने ईजाद किया है जो हिटलर, मुसोलिनी, तोजो जैसे तानाशाहों को बर्बाद कर चुका है और शहंशाह तथा महाराजाओं को अपदस्थ कर चुका है। लोकतंत्र का ये सुर-असुर संग्राम राजाराम से लेकर आज के भारतीय नागरिक तक सब लड़ रहे हैं और महावीर, बुद्ध और गांधी सभी इस सनातन मानवधर्म के गवाह हैं।
इसीलिए चिंता मत करिए और सत्य-अहिंसा तथा समानता का एक भारत-श्रेष्ठ भारत बनाते रहिए क्योंकि ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा भी रामायण-महाभारत से निकला है। ये कोई एकात्मवाद की नई धारणा नहीं है। आज के भारत में लोकतंत्र और संविधान को सबसे अधिक खतरा उनसे ही है जो धर्म संप्रदाय और जाति की सेनाएं बनाकर गाय, गंगा, गीता और तिलक-तराज के नाम पर हिंसा फैला रहे हैं और दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और महिलाओं को गैरबराबरी के नर्क में धकेल रहे हैं। भारत की 50 करोड़ युवा-बेरोजगारी आबादी आज इसीलिए अच्छे दिनों के सपनों से मारे जा रहे हैं।

हमें तनिक भी निराश नहीं होना चाहिए क्योंकि आशा का दूसरा नाम ही लोकतंत्र है और समता का दूसरा अर्थ ही संविधान है और जनता का दूसरा नाम ही संसद है और ईश्वर का दूसरा नाम ही न्यायपालिका है। विज्ञान और ज्ञान की खोज लोकतंत्र की ताकत है तो शिक्षा और संगठन ही भारत में विविधता की एकता है। लिंकन, गांधी, पेरियार और अंबेडकर की मूर्तियां तोड़ने वाले और रामनवमी और हनुमान जयंती पर सांप्रदायिक हिंसा तथा नफरत फैलाने वाले जानते हैं कि लोकतंत्र का विकल्प धार्मिक राष्ट्रवाद नहीं है लेकिन फिर भी इतिहास से पराजित-मानसिकताओं से लड़ना ही आज हम सबका धर्म है, क्योंकि-समय और शासक की अंतिम अदालत ये लोक स्वराज्य ही हैं।

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