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यूपी में व‍पिक्ष से ज्‍यादा अपने ही लोग बढ़ा रहे है, बीजेपी की परेशानियां

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लखनऊ – हाल के घटनाक्रमों से परेशान भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के एक पदाधिकारी कहते हैं कि उन्नाव रेप कांड पर पार्टी अपना स्टैंड कैसे रखेगी। इस पर मीडिया में जाने वालों से अब तक एक बार भी चर्चा नहीं की गई। इसका नतीजा पैनलिस्ट दीप्ति भारद्वाज के बयानों के ‘उबाल’ के तौर पर सामने आया।

कमोबेश यही हालात सरकार में भी जिम्मेदारों के दिख रहे हैं। सरकार-संगठन दोनों ही विपक्ष से कहीं अधिक ‘भीतर’ के मोर्चे से परेशान हैं। इनके खिलाफ कोई ऐक्शन न होने के चलते अब सिलसिला बढ़ता जा रहा है। 325 विधायकों के विशाल बहुमत के साथ जब बीजेपी सत्ता में आई तो मुख्यमंत्री के पद को ‘सुशोभित’ करने के ख्वाब बहुतों के थे। इस ख्वाब के टूटने के बीच की ‘खाई’ अब तक पट नहीं पाई है बल्कि इसका विस्तार और नीचे तक हो चुका है।

वहीं, बहुमत की ख्वाहिश में पार्टी में आयात किए गए बहुत से प्रभावी नेताओं की समानांतर ‘सत्ता’ चलाने की महत्वाकांक्षा अभी बनी हुई है। इसका असर यह है कि किसी बड़े घटनाक्रम में बैठकर उसका समाधान निकालने की बजाय अपनी ‘संभावनाएं’ मजबूत करने की होड़ बढ़ती जा रही है।

आम हैं ‘मतभेद’ की खबरें
सरकार और संगठन में महत्वाकांक्षाओं की टकराहट की खबरें आम हैं। उपचुनाव के नतीजों के बाद इसको और बल मिला है। मुख्यमंत्री और एक उपमुख्यमंत्री के कुछ कार्यक्रमों में मंच साझा न करने की बातें आईं। हाल में ही मुख्यमंत्री दिल्ली मिलने गए तो पार्टी के ही एक धड़े ने प्रदेश अध्यक्ष बदलने की खबर उड़ा दी। शायद यही वजह रही कि अमित शाह अपने एक दिनी लखनऊ दौरे में सरकार और संगठन के शीर्ष लोगों के साथ अलग-अलग बैठकर ‘कबूलनामा’ लिखवा कर गए हैं।

हालांकि, इसका असर दिखना अभी बाकी है। पार्टी के एक नेता कहते हैं कि सरकार और संगठन में सबसे बड़ा संकट यह है कि ‘ऐक्शन’ शून्य है। विधानसभा में राज्यपाल का लगातार दो बार गलत अभिभाषण लिखने वाले अफसरों पर न कोई ऐक्शन होता है और न ही गलतबयानी करने वाले पार्टी के सांसद-विधायक पर। भले इसके पीछे मंशा सुधरने का मौका देने की हो, लेकिन सार्वजनिक तौर पर संदेश ‘मजबूरी’ का अधिक जाता है।

फिर आएंगे शाह
2019 के पहले यूपी में ‘सबकुछ ठीक’ करने के लिए कर्नाटक चुनाव के बाद अमित शाह खुद जुटेंगे। शाह संगठन के लिए होमवर्क देकर गए हैं। बड़ों को नसीहतों भी दी है कि सुधार की पहल खुद से करिये।

मर्यादाएं टूटती रहीं, ज‍िम्‍मेदार चुप रहे
• अगस्त के पहले पखवारे में गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत की घटना में सबसे अधिक किरकरी स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह के बयान ने करवाई कि ‘अगस्त में बच्चे मरते हैं।’
• हज कमिटी कार्यालय को भगवा करने पर सरकार व संगठन की लाइन पर बात किए बिना मोहसिन रजा इसे सही ठहराते रहे, जबकि सरकार को बिल्डिंग का रंग बदलना पड़ा।
• सांसद चौधरी बाबूलाल, छोटेलाल खरवार, अशोक दोहरे और सावित्रीबाई फूले ने जमकर मोदी-योगी सरकार की बखिया उधेड़ी, लेकिन कार्रवाई पर चुप्पी है।
• बीजेपी सांसद हरीश द्विवेदी, विधायक दीनानाथ भास्कर, रामशरण वर्मा सहित कई विधायक योगी सरकार के खिलाफ ही धरने पर बैठ चुके हैं।
• गठबंधन सहयोगी ओमप्रकाश राजभर समय-समय पर योगी सरकार पर संगीन आरोप लगाते रहे हैं।
• गोरखपुर-फूलपुर लोकसभा उपचुनाव के ठीक पहले मंत्री नंदगोपाल नंदी ने विपक्ष के नेताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी की, जो पार्टी पर भारी पड़ी। कार्रवाई की जगह नंदी मुख्यमंत्री के साथ पूजा-पाठ करते नजर आए।
• पंचायत एवं निकाय चुनाव में सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह सहित दूसरे सांसदों-विधायकों ने संगठन की मंशा के खिलाफ उम्मीदवार उतारे, पार्टी मूकदर्शक बनी रही।
• ‘तीन बच्चों की मां से कोई रेप नहीं करता’ के सिद्धांत का ‘प्रतिपादन’ करने वाले बलिया के बैरिया विधायक सुरेंद्र सिंह पहले भी बड़बोले बयान देते रहे हैं।
• पार्टी के प्रदेश संगठन महामंत्री के खिलाफ एक रिटायर्ड आईएएस सार्वजनिक तौर पर लगातार गंभीर आरोप लगा रहे हैं। पार्टी ने पलटकर जवाब देने की जहमत नहीं उठाई।

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