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हम सब हैं झूठे और झांसेबाज

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राव दिलीप सिंह/राजसमंद – इस सत्य को हममें से कोई भी स्वीकार नहीं करेगा कि हम झूठे हैं। उंगलियो पर गिनने लायक लोग ऎसे हो सकते हैं जो कि सतयुग की बजाय जाने किस दुर्भाग्य और किसकी गलती से कलियुग में पैदा हो चुके हैं वरना हम सभी उस श्रेणी में आते हैं जो कि झूठ सुनने और बोलने में माहिर हैं। बावजूद इसके कभी कोई हमें झूठा कह दे तो हम हाथ धोकर पीछे पड़ जाते हैं, प्रतिकार की मुद्रा में आ जाते हैं और प्रतिशोध की चरम अवस्था तक पहुंच कर संबंध तोड़ देने तक को आमादा हो जाते हैं।

झूठ को स्वीकार करना कोई नहीं चाहता क्योंकि हम जो कुछ झूठ बोलने के आदी हो चुके हैं वह हमारी रोजमर्रा की जीवनशैली का हिस्सा हो गया है इसलिए हमें अपने द्वारा कही गई और दूसरों के मुँह से सुनी गई झूठी बातें भी झूठ प्रतीत नहीं होती।

इसका मूल कारण यह है कि झूठ को हम सहज स्वीकार्यता दे चुके हैं और यह मान लिया है कि इतना झूठ बोलना तो चलता है, इसे झूठ में शामिल नहीं किया जा सकता क्योंकि सभी लोग तो ऎसा ही कर रहे हैं, फिर हम कहाँ-कहाँ बचे रहें।

असल बात यह है कि हम इंसानों के लिए अपने स्वार्थ और ऎषणाओं की पूर्ति, आरामतलबी और भोग-विलास भरी जिन्दगी पाना ही मूल उद्देश्य रह गया है। इसलिए हम बहुसंख्य लोग उस झूठ को झूठ नहीं मानकर लोकाचार और लोक व्यवहार का अंग बना चुके हैं जो कि हमारे स्वार्थ पूरे करता है, हमें कहीं न कहीं वैध-अवैध लाभ देता है।

अब हमारी जिन्दगी शुचिता भरी रही ही नहीं है। हम सभी अपने हक में सब कुछ भुनाना चाहते हैं और इस तरह जिन-जिन लोगों से हमारे संबंध हैं वे भी सारे के सारे हमारी ही तरह हैं इसलिए कौन झूठ को झूठ के रूप में स्वीकारे।

झूठ कलियुगी इंसानों के लिए वह हथियार है जो कि हमेशा असरकारी भूमिका में रहता है। झूठ के अंधकार में वह सब कुछ जायज है जो किया जा सकता है। आम तौर पर हमसे कोई पूछे तो हम कभी स्वीकार नहीं करते कि हम झूठ बोलने के आदी हैं, भले ही सवेरे जगने से लेकर रात को सोने तक हम खूब सारे झूठ का प्रयोग क्यों न करते रहें।

जो झूठ सर्वमान्य और सर्वस्वीकार्य हो चुका हो, उसे भला कौन झूठ के रूप में स्वीकार करेगा ? हम सभी लोग इसी बात को लेकर चिन्तित और दुःखी रहा करते हैं कि भगवान हमारी नहीं सुनता, लोग हमारी बातों पर ध्यान नहीं देते, हमेशा असफलता हाथ लगती है। लेकिन इसके पीछे के रहस्य को कोई समझना नहीं चाहता। जो लोग झूठ पर झूठ बोलते चले जाते हैं उनकी वाणी कभी सत्य हो ही नहीं सकती। और यही कारण है कि हमारा कहा या सोचा हुआ कभी होता ही नहीं।

सत्य से परे जाकर झूठ का आश्रय लेकर हम जो भी संकल्प लेंगे, उनमें सत्य की सकारात्मक ऊर्जा रहेगी ही नहीं, बल्कि झूठ का नकारात्मक आभामण्डल लेकर जो भी शब्द या वाक्य बाहर जाएगा, वह अपने आप दमहीन होकर निष्प्रभावी हो जाएगा और इसका कोई प्रभाव सामने नहीं आ पाएगा। फिर हमारे द्वारा बोले और सुने जाते रहने वाले झूठ के कारण हमारी वाणी कभी फल नहीं देती क्योंकि वह है ही पूरी तरह मिथ्या। जब हमारी आदत में ही झूठ शुमार हो चुका है तब भगवान भी नहीं सुनता क्योंकि हमारी छवि उसके दरबार में ऎसे लोगों की श्रेणी में शामिल होती है जो आदतन झूठे हैं और इसलिए झूठे लोगों की कोई भी मांग या इच्छा पूरी नहीं की जा सकती।

अधिकांश लोग आवश्यकता पड़ने पर दो मिनट-पांच मिनट में आने या गंतव्य की ओर जाने की बात कहते नहीं थकते जबकि इन्हें पता होता है कि इतने कम समय में यह संभव नहीं हो पाएगा। पर हमारी आदत पड़ गई है क्या करें। कई बार हम अपने मुँह से ऎसे-ऎसे झूठ और नकारात्मक इच्छाओं का प्रस्फुटन करते रहते हैं और भगवान यदि हमारी प्रार्थनाओं को सुनकर हमारी वाणी को सफल करता रहे तो दुनिया बरबाद ही हो जाए क्योंकि हम अपनी पूरी जिन्दगी में अपनी भलाई की कम तथा दूसरों के नुकसान के बारे में अधिक सोचते हैं। और इससे भी आगे बढ़कर औरों की क्षति को देखकर हमें भीतर तक प्रसन्नता का अनुभव होकर अवर्णनीय सुकून का अहसास भी होता है।

अपने वादों से मुकरना, किसी को जुबाँ देकर मुकरना, किसी भी काम के होने या कर देने के बारे में झांसे देते रहना और काम नहीं कर औरों को आज-कल और परसों पर टालते रहना, सच्ची बात नहीं बताकर गुमराह करते चले जाना और दूसरों को भ्रमित करते हुए अपने स्वार्थ पूरे करना तथा उल्लू और उल्लू के पट्ठों को सीधे करने के उपक्रम में रमे रहना भी पक्के तौर पर ऎसा झूठ है जिसका पाप सभी झूठों और झाँसेबाजों को भुगतना ही पड़ता है चाहे वे कितने ही बड़े ओहदेधारी, वैभवशाली, महान, बाबाजी और लोकप्रिय हस्ती ही क्यों न हों। इन झांसेबाजों को यह पता नहीं है कि वे जिस तरह झूठ पर झूठ बोलकर भरमाते रहे हैं उसका पाप उन्हें अधिक भोगना पड़ेगा क्योंकि यह सब वे जानते-बूझते हुए चतुराई, धूर्तता और स्वार्थ में डूबे रहकर ही किया करते हैं। आजकल सर्वत्र झूठों और झांसेबाजों का ही तिलस्म सभी जगह दिखता है। क्यों न हम अपने सम्पर्क में आने वाले लोगों को सही-सही बता दें कि उनके काम का हश्र क्या होना है। काम होना भी है या नहीं होना है। किसी को लटकाए रखना, भ्रमित करते हुए उसका शोषण करते रहना, उल्लू बनाना, अपने आगे-पीछे चक्कर कटवाना आदि सब उन पापों की श्रेणी में शामिल हैं जिनका कोई प्रायश्चित या परिहार नहीं है। इन पापों के क्रूरतम दण्ड को एक जन्म में पूरा भोग लेना संभव नहीं है। इसके लिए हमें कई जन्म लेने पड़ेंगे। इस सत्य को कोई समझना नहीं चाहता। झूठों और झांसेबाजों के भीतर से धर्म, सत्य और चक्रीय ऊर्जा बाहर पलायन कर जाती है और तब ये झूठे लोग जिन्दगी भर खोखले बने रहते हैं।
यही कारण है कि इन झूठों और झाँसेबाजों को बाद में कठपुतली या बिजूकों की तरह जिन्दगी गुजारनी पड़ती है। लोग इनका मनमाना इस्तेमाल करते हैं और दुनिया इन पर हँसती भी है, इन पर रोना भी आता है और इनके लिए बददुआओं की बारिश भी होती रहती है।
फिर हर झूठे का अंत कैसा होगा, इस बारे में आसानी से समझा जा सकता है।

आज की दुनिया इन्हीं झूठों और झांसेबाजों से परेशान है। फिर ऎसे लोगों के लिए दुनिया का कोई सा कुकर्म बुरा नहीं रह जाता क्योंकि झूठ अपने साथ सारे अवगुण लेकर आता है। सभी अवगुणियों, चोर-डकैतों, लूटेरों, रिश्वतखोरों, भ्रष्टाचारियों और लोगों को उल्लू बनाने वालों के चरित्र की परख की जाए तो यही सामने आता है कि उनका पूरा तिलस्म और कारोबार झूठ की बुनियाद पर ही टिका हुआ है।

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