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पुस्तक समीक्षा : पथिक मैं अरावली का

  • गुलाबचंद जिंदल (अजमेर)

‘अरावली पर्वत’ – इस देश का सबसे प्राचीनतम पहाड़. असल में यह विशाल पहाड़ कई-कई पहाड़ों की श्रृंखलाओं से मिलकर बना पहाड़ हैं, जिसकी शुरुआत गुजरात प्रांत के बनासकांठा ज़िले के इडर कस्बे से मानी जाती हैं, तो अंत दिल्ली के रायसीना हील तक. लेखक महोदय ने भी अरावली के इस उद्गम स्थल ‘इडर’ पहाड़ की अभ्यर्थना कर अपनी यात्रा प्रारंभ की हैं. बचपन में मैं भी अरावली पर्वत श्रृंखला की स्थानीय पहाड़ियों में बहुत घुमा हूँ. जैसे लेखक को पहाड़ प्रिय हैं वैसे मुझे भी बहुत प्रिय हैं, यह बात दीगर हैं कि वक़्त के साथ कोई अपने शौक को परवान रखता हैं तो कोई न चाहते हुए भी दूर से ही उसका दीदार कर लेता हैं या ऐसी पुस्तकें पढकर मानसिक यात्रा कर लेता हैं या शारीरिक रूप से थोड़ी देर को ही सही ऐसी किसी यात्रा का हिस्सा बन जाता हैं. लेकिन दिल के किसी कोने में पहाड़ों को बसाए रखता जरूर है.

इस किताब को जब पहली बार हाथ में लिया और अरावली पर्वतमाला को पार्श्व में रखकर जब इसका फोटो क्लिक किया तब फिल्म ‘जॉनी आई लव यू’ (1982) में लताजी का गाया सदाबाहर गीत ‘कभी-कभी बेज़ुबान परवत बोलते हैं, परवतों के बोलने से दिल डोलते हैं’ बार-बार दिल और दिमाग में बज रहा था. सचमुच इस किताब को अगर आप भी पढोगे एवं आप भी किसी पर्वत की यात्रा पर कभी जाओगे तो पर्वत आपके ख़्वाबों-ख्यालो में जरूर बतियाते रहेंगे. पहाड़ों की तासीर ही ऐसी होती हैं. बचपन में जब मैं ननिहाल से पैदल ऊँची-ऊँचे पर्वतों, उनकी खाइयों के बीच से ऊँची पगडंडी पर चलते हुए अपने गाँव पहुँचता था. तब एक नियत स्थान पर धोरों की चोटी तक पहुँचने ही घाटीयों की ओर मुखातिब होकर जोर से आवाज़ लगाता था और वह आवाज़ वादियों के जर्रे-जर्रे से टकराकर गुंजन करती हुई पुनः मुझ तक पहुँचती थी.

यात्रायें करना अपने आप में जीवन विकास के सोपानों पर चढने की प्रक्रिया हैं तो उसे सहेज कर भावी पीढ़ियों को दस्तावेज़ के रूप में सौंपना लाखों-करोड़ों लोगों को भूगोल, इतिहास, संस्कृति, धर्म-अध्यात्म, पर्यावरण और ज्ञान-विज्ञान का प्रचार-प्रसार भी. लेखक महोदय ने भी इस पुस्तक में अरावली पर्वतश्रृंखला की गोद में विचरण करती प्राकृतिक वन सम्पदा, पशु-पक्षी, विभिन्न समुदाय और उनकी संस्कृतियों को करीने से अंकित किया है. यात्राएं करने वालों को पता होता हैं कि वे यात्राओं से क्या पाते हैं, लेकिन जो लिख कर उसका दस्तावेजीकरण नही करते वो नही जानते कि वे अपने साथ क्या-क्या ले जाते हैं जो समय के गहन अंधकार में खो जाता हैं. राम-सीता का चौदह वर्षीय वनगमन, तथागत का अभिनिष्क्रमण, महावीर स्वामी का केवल्य भ्रमण, आदि शंकराचार्य की दिग्विजय यात्रा, राहुल सांकृत्यायन की देश-विदेश की यात्राएं. इसके आलावा और भी अनगिनत यात्राएं हैं जिससे हमारा साहित्य, ज्ञान-विज्ञान, धर्म-अध्यात्म और पर्यावरण का दस्तावेजीकरण हुआ हैं जो हमें आज भी आलोकित करता हैं.

यह पुस्तक सामान्य पाठकों के लिए तो उपयोगी हैं ही; शोधकर्ताओं, अद्येताओं, सन्दर्भकर्ताओं और हम जैसे कई उन सामान्य जिज्ञासुओं के लिए भी सहेजने योग्य बन गई हैं जो इस यात्रा में किसी न किसी तरह सहभागी रहे. लेखक अरावली के पहाड़, वनस्पति जगत, प्राणी सम्पदा, भू-सम्पदा, पर्यावरण संबंधी बातों की तो तफसील से ज़िक्र करते ही हैं, वहां निवासरत जिन लोगों से वे मिलते हैं उन साथियों का विस्तृत परिचय कराकर, उनसे हुआ संवाद भी इस पुस्तक के माध्यम से देश-दुनिया के पटल पर रखते हैं.

अरावली की इस यात्रा की महत्ता क्या हैं? इसकी बानगी लेखक महोदय के नजरिये से समझिये. वे पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं – “अरावली में आ रहे बदलावों को अपने सामने देख मुझे महसूस हुआ कि कुछ साल बाद अरावली पर्वत महज़ किताबों में पढने को मिलेगा. हमारी आने वाली पीढ़ियाँ शायद जान भी न पायेंगी कि कभी सघन जंगलों और उन्नत पहाड़ियों की श्रृंखला वाला अरावली जमीन पर था. कुम्भलगढ़ क्षेत्र में मैंने तीन दशक पहले देखा और अब जब देखता हूँ तो जमीन-आसमान का अंतर दिखलाई पड़ता है. पहले पहाड़ी पर बड़े-बड़े पेड़ खड़े थे, अब पेड़ काट कर होटल उगा दिए गए है, जगह-जगह अरावली का सीना चीर कर पहाड़ काट कर सडकें बनाई जा रही है. नदियों, झीलों और तालाब सबके किनारे पर लोग ही लोग नजर आते हैं और ऐसा लगता हैं जैसे अरावली पर्वत किसी बड़े बाज़ार में बदल गया हैं.”

“अरावली खनिज का भंडार हैं, इसका दोहन सदियों से सीमित मात्रा में होता रहा हैं, जरूरत जितनी वस्तुएं हमारे पुरखों ने भी खुदाई करके निकाली, लेकिन सिर्फ अपने और स्थानीय समुदाय के उपयोग के लिए ही, आज तो हर प्रकार का खनन ज़ारी है. बहुत सारी जगहों पर तो खनन माफ़िया पूरी-पूरी पहाड़ियों को निगल गया है, ऐसे भी इलाके हैं जहाँ पर अब अरावली के नाम पर सिर्फ खड्डे अथवा मलबा नजर आता है. पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव-विविधता सब नष्ट हो रही है, यह सोचकर हर बार मुझे लगता कि एक बार पूरा अरावली घूम लिया जाये, बाद में न जाने यह बचे या न बचे, हालाँकि अरावली का बचना हम सबके बचने के लिए बेहद जरूरी है. अरावली सिर्फ पहाड़ ही नही हैं, वह हमारी सभ्यता और संस्कृति का संरक्षक भी हैं और आज भी अपने आप में एक पूरी दुनिया को समेटे हुए हैं. कई सालों तक कई-कई बार सोचा कि अगर कभी मौका मिलेगा तो मैं सम्पूर्ण अरावली की यात्रा करूँगा, सिर्फ पर्यटन उद्देश्य नहीं, बल्कि अपने भीतर बाहर बसे इस प्राचीन पहाड़ से वास्तविक मुलाकात करूँगा, उसकी आवाज़ सुनुँगा और मेरी बात उसे कहूँगा.”

पुस्तक में कुल जमा पच्चीस स्थानों की यात्राएं हैं और पच्चीस ही शीर्षक/अध्याय हैं. दिन और अनुक्रमणिका के अभाव में इन अध्यायों का क्रम इस प्रकार हैं – अरावली की अभ्यर्थना, बीस हजार साल पुरानी मानव सभ्यता – चन्द्रावती नगरी, आबू रा पहाड़ों में मलजी मोर बोले ओ…, गौडवाड की धरा पर…, उड़ने वाली गिलहरियों के इलाके में, प्रताप की राजतिलक स्थली पर, मेवाड़ की राजधानी – पूर्व का वेनिस, भूरेटिया नी मानूं रे भूरेटिया…, कालीबाई भील और नाना लाल जी खांट का बलिदान, बैणेश्वर का आदिवासी कुम्भ, देवली मीनी की शौर्य गाथा, गढ़ तो बस चित्तौड़ बाकी सब गढ़हैया…, गुर्जर गरीबों कनीराम बोले, हल्दीघाटी का गाइड खान, मूंछों वाले महावीर जी, चीन की दीवार जैसी है कुम्भलगढ़ किले की दीवार, सिया बनास के किनारे-किनारे, पद्मभूषण का पिपलान्त्री प्रयोग, रूपनगर का रहस्यमय क़िला, पन्ना काली वा अंधियारी मांझल रात…, अरे घास री रोटी ही जद बन बिलावड़ो ले भाग्यो…, सिद्धों की खोज, बैराठ भवानी धीणा कोट और आस पहाड़ की धूणी, ‘बी अवेयर’ से ब्यावर तक एवं अंतिम अध्याय हैं बुद्ध और पुष्कर.

इन पच्चीस दिनों में की गई यात्राओं के शीर्षकों/अध्यायों में कई जगहों और लोगों से मुलाकातों को उप शीर्षकों के ज़रिये गतिशिलता प्रदान की गई हैं. एक नज़र उन पर डाल लेते हैं – इडर से आगाज़, दौलतसी का महल, रूठी रानी का महल, इडर से प्रस्थान, खेड़ब्रह्मा से गुणभाखरी, चित्र-विचित्र का मेला और आकल-वाकल का संगम, राजस्थान का पहला गाँव, भद्रकाली मंदिर उमरनी, राजा अम्बरीश का ऋषिकेश, चन्द्रावती सभ्यता, भूला-वालोरिया का भील विद्रोह, क्षत्रियों की उत्पत्ति, गुरु शिखर का पीतल का घंटा, बालम रसिया की नक्खी झील, विवेकानन्द की चंपा गुफ़ा, टॉड रॉक, अचलगढ़ के तीन पाड़ा, देलवाड़ा का जैन मंदिर, आबू को अलविदा, संघवी भैरू तारक, पावापुरी तीर्थ धाम सिरोही, सार्णेश्वर महादेव मंदिर, सिरोही दुर्ग का अधुरा विजिट, लोदरा माताजी पीपेला, लंगोटिया भाटा और भीम पहाड़, कपिल देव का मजावडी बालिका वन, करणसिंह जी झाला से मुलाकात, महाराणा प्रताप स्मारक, सज्जनगढ़ वन्यजीव अभ्यारण्य, सज्जनगढ़ का मौसमी महल, सिटी पैलेस, अमर बलिदानी कालीबाई भील, गलियाकोट दरगाह में भेदभाव और डायन प्रेत का अन्धविश्वास, मानगढ़ : जलियांवाला बाग़ हत्याकांड से बड़ा नरसंहार, रघुनाथ पीर की धुणी, हाथी गुडा की नाल, जहाँ हाथी उन्मुक्त चरते थे और महावत घर बसा कर रहते थे, चाइना के बाद दुनिया की सबसे बड़ी दीवार, लक्की गेस्ट हाउस का देशी खाना, रावली अभ्यारण्य में जंगल सफारी, मायड थारो वो पूत कठे, फूटा देवल और मातृ हन्ता परशुराम का मंदिर, पगल्या जी की नाल का रामदेव थान, डॉ. गोविन्द सिंह जी से मुलाकात, गोमती नदी के उद्गम पर ठहराव और सेवन्त्री से आगे का सफर, मैराथन ऑफ़ मेवाड़-दिवेर स्मारक, कोट सोलंकियान-हरचंद पीर की धुणी, गौरी धाम का रोमांचक सफ़र, पन्ना धाय द्वारा चंदन का बलिदान, आसान के दाता-कूंपा राम जी और मियाला के धनराज पीर, उंडीरेल की नाल से गौरम घाट का सफ़र, काजलवास की धुणी से सीरियारी के संत तक, निर्मला पीर सारण के कर्नल टॉड की कर्मभूमि टॉडगढ़ तक, राजुडा रावत का विद्रोह और मोहन बा की समाधि, देवडूंगरी जहाँ से आरटीआई आई!, ख्वाज़ा की चौखट पर!, पाल बीचला का बाबा रामदेव मंदिर!, बुद्ध ज्योति विहार अजमेर.

यह पुस्तक अरावली के सफर के पहले चरण में की गई पच्चीस दिन की यात्रा का लेखा-जोखा है. जिसमें गुजरात प्रान्त के इडर शहर से अजमेर तक के सफर को कवर किया गया हैं. 224 पृष्ठों की इस पुस्तक में जो बात खलती हैं वो ये कि पुस्तक के प्रारंभ में एक अदद सूचि नदारद हैं जिसे मेरे ख़याल से जरूर होना चाहिए था, दूसरे, जब हर अध्याय या यात्रा वृतांत को पहला, दूसरा, तीसरा दिन … के साथ अध्याय के शीर्षक के नाम दे दिए गए हैं तो उसकी तारीख या तिथि भी दी जा सकती थी, तो ये यात्रा वृतांत तवारीख के लिए तथ्य में बदल जाते. आप सिर्फ अनुमान लगा सकते हैं, इस आधार पर कि लेखक ने इस पुस्तक की भूमिका 30 अक्टूबर, 2023 में लिखी थी या पुस्तक के किसी अध्याय में कहीं किसी तारीख या तिथि का ज़िक्र आ जाए तब. हालाँकि इससे यात्रा वृतांत और पुस्तक में निहित कंटेंट पर कोई फर्क नही पड़ता. फिर भी मुझे ये कमी लगती है.

पुस्तक के अंत में लेखक अजमेर में अपनी इस ऐतिहासिक यात्रा के प्रथम चरण के समापन पर ‘चरैवेति चरैवेति’ शीर्षक के अंतर्गत लिखते हैं – “अजमेर को चौहान अजयपाल ने बसाया था. तारागढ़ का क़िला अकबर ने बनवाया, यहाँ ढाई दिन का झोंपडा भी है तो सोनी जैन मंदिर भी, आना सागर झील है तो निकटस्थ तीर्थराज पुष्कर भी. अरावली का हृदय क्षेत्र नाग पहाड़ भी है, जहाँ से निकली लूणी नदी मारवाड़ की प्यास बुझाती है. यहाँ हिन्दू, मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध तथा ईसाई धर्मावलम्बियों के आस्था स्थल हैं. अजमेर एक लघु भारत है, सेकुलर इंडिया का प्रतीक, यहाँ पर विभिन्न धर्मों व पंथों के स्थलों की ज़ियारत, दर्शन व भ्रमण और लोगों से मुलाक़ातों के बाद अरावली के इस सफ़र के पहले चरण का समापन इस उम्मीद से किया कि दूसरे चरण में नाग पहाड़ से प्रारंभ कर भानगढ़ के रहस्यमय वीरान किले तक जायेंगे और उसके पश्चात आख़िरी चरण में लुटियंस के टीलों तक का सफ़र करके अरावली की इस यात्रा का अंत करेंगे, तब तक चलते रहेंगे, चलते रहेंगे…!”

(प्रकाशक – राजपाल एंड सन्ज़, 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली – 110006 , पहला संस्करण – 2024, कुल पृष्ठ – 224, मूल्य ₹ 375)

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Author: dailyrajasthan

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